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रणक्षेत्र में बदल रही बंगाल की चुनावी ज़मीन

  • सैयद फसीउल्लाह निज़ामी “रुमी”
          तमिलनाडु, असम,केरला, पांडिचेरी के अलावा बंगाल में भी विधानसभा चुनाव हो रहे हैं जिसके पहले चरण की वोटिंग 27 मार्च को होनी है।इस चुनाव में सारी राजनीतिक पार्टियों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी दी है लेकिन मुख्य मुकाबला भाजपा व तृणमूल कांग्रेस के मध्य है। बंगाल के इस चुनावी समर में चुनावी मंच पूरी तरह से रंगमंच में परिवर्तित हो चुका है और बंगाल की ज़मीन रणक्षेत्र में बदल चुकी है।हमने रंगमंच पर मंझे हुए अभिनेताओं को अपनी कला का प्रदर्शन करते हुए बराबर देखा है पर देश के सियासी अभिनेताओं को हम सिर्फ चुनाव में ही अपनी कला का प्रदर्शन करते देखते हैं जिस तरह आज बंगाल में दिख रहा है।
हम अपना प्रतिनिधि इसलिये चुनते हैं कि वह हमारा प्रतिनिधित्व करते हुए हमारी आवाज़ को संसद व विधानसभा में पुरजोर ढंग से उठाए पर जब यही प्रतिनिधि जनता द्वारा चुन कर लोकतंत्र के मंदिर में प्रवेश करता है तो कुछ को छोड़कर ज़्यादातर अपना ही स्वार्थ सिद्ध करने में लग जाते हैं।आज बंगाल के चुनाव की घोषणा हो चुकी है और 2 मई की शाम तक ये राजनीतिक कलाकार चुनकर हमारे नुमाइंदे बन चुके होंगे।वैसे  दुनिया के जितने भी लोकतांत्रिक देश हैं वे चुनावी प्रक्रिया से बराबर गुज़रते रहते हैं या यूँ कहें कि लोकतंत्र की स्थापना में चुनावी प्रक्रिया एक अहम रोल निभाती है।हमारा देश भी एक लोकतांत्रिक देश है इसलिये हम लोग बराबर ही चुनावी दौर से गुजरते रहते हैं।आजकल देश के बंगाल समेत कुल 4 और राज्यों में चुनावी सरगर्मी है। इस वक़्त पूरे बंगाल में प्रान्त में  चुनावी मंच सज चुके है व नेताओं का चुनावी मंच से भाषणबाजी का दौर भी चरम पर है।चुनावी मंच से पार्टी के प्रतिनिधि,प्रत्याशी व स्टार प्रचारक अपनी पार्टी की नीति व घोषणा पत्र के हिसाब से भाषण भाषण देते हुए लोक लुभावने वादे भी करते नज़र आ रहे हैं।
चुनावी मंच से राजनीति के मंझे खिलाड़ी नेता कम अभिनेता व रणक्षेत्र के सिपाही ज़्यादा लग रहे हैं।कोई किसी को गुंडा बता रहा है तो कोई किसी को राक्षस बताते नहीं थक रहा।ये सियासत के बहरूपिये अपने भाषणों से जनता को ख़ूब आश्वासन दे रहे हैं कोई बंगाल को सोनार बंगला बनाने की बात उठा रहा है तो कोई हर महीने खाते में रकम देने की बात उठा रहा है।बात यहीं तक हो तो ठीक है लेकिन सियासत के मैदान के मंझे हुए ये खिलाड़ी जनता को आकर्षित करने में मर्यादाओं की सीमा भी लांघने से बाज नहीं आ रहे हैं।एक जमाने में चुनाव के दौरान हमारे प्रत्याशी चुनावी मंच से रोटी,कपड़ा,मकान के अलावा रोजगार,किसान,मज़दूर,मंहगाई,सड़क,पानी,
बिजली व शिक्षा की बात करते थे।ये नेता न  धर्मवाद को और न ही जातिवाद को अपना मुद्दा बनाते थे बल्कि जनहित की बातों व जमीनी मुद्दे ही अपने घोषणा पत्र में रखते थे।
कभी 2 सीट पर विजय पाने पार्टी भाजपा के बड़े नेता कहते नज़र आ रहे हैं कि दीदी ने इस राज्य को 10 साल लूटा और लेफ्ट ने 25 वर्ष लूटा और उनके गुंडे आतंक मचा रहे हैं वहीं  ममता कहती हैं कि ये भाजपा के लोग बाहर से गुंडे भेज रहे हैं।अब आज की सियासत पहले वाली सियासत नहीं रही जब कोई चुनावी प्रत्याशी अपने विरोधी प्रत्याशी के साथ बैठ कर चाय पीता हो।यहाँ तो आज अनुशासन को ठेंगा दिखाते हुए ये नेता एक दूसरे को झूठा साबित करने पर आमादा हैं।किसी को रोजगार मिले न मिले पर पर ये नेता इन बेरोजगारों को भी जाति व धर्म का पाठ पढ़ाने से बाज़ नहीं आ रहे हैं।देश के माननीय प्रधानमंत्री तक को मंच से बाहरी करार दिया जा रहा जबकि वे भी भारत के अभिन्न अंग गुजरात प्रान्त से हैं।वहीं हमारे उच्च पदासीन राजनीतिक व्यक्ति एक जनता द्वारा चुनी मुख्यमंत्री को गुंडा कहने से नहीं हिचकते।अब सवाल यह कि हमें ज़रूरत है राशन ,रोजगार ,शिक्षा,स्वास्थ्य की तो ये चुनावी  रंगमंच के सियासी अभिनेता हमें धर्म व जाति में बांट कर अपना उल्लू सीधा करना सीधा करना चाहते हैं।वैसे जनता भी अब जागरूक हो चुकी है और इन्हें इन्हीं की भाषा में जवाब भी देना जानती है

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