“इंसान बकरे को बेटे की तरह पालता है…” — बकरीद पर देवरिया के ईश मोहम्मद ने दी खुद की कुर्बानी

- कुर्बानी का मतलब समझते हुए,एक बुजुर्ग ने लिया जीवन का आखिरी फैसला
गौरव कुशवाहा
देवरिया। बकरीद एक ऐसा त्योहार जिसे इस्लामी समाज में भाईचारे, श्रद्धा और बलिदान के प्रतीक के तौर पर मनाया जाता है। हर कोई अल्लाह की राह में अपनी आस्था के मुताबिक जानवर की कुर्बानी देकर इस दिन की पवित्रता को निभाता है। लेकिन जिले की एक घटना ने इस दिन के मायनों को झकझोर कर रख दिया।
शनिवार को जब पूरा देश एक-दूसरे को गले लगाकर बकरीद की मुबारकबाद दे रहा था, तब गौरीबाजार थाना क्षेत्र के उधोपुर गांव में रहने वाले 60 वर्षीय ईश मोहम्मद ने ऐसा कदम उठा लिया, जिसे जानकर दिल दहल जाए। धार्मिक प्रवृत्ति के इस बुज़ुर्ग ने अपने ही हाथों, उसी बकरे को काटने वाले छुरी से अपनी गर्दन काटकर खुद की कुर्बानी दे दी। यह घटना न केवल चौंकाने वाली थी, बल्कि धार्मिक, सामाजिक और मानसिक विमर्श को भी जन्म दे गई।
मिली जानकारी के अनुसार ईश मोहम्मद हर बार की तरह इस बार भी बकरीद से पहले अम्बेडकर नगर स्थित किछौछा के सुल्तान सैयद मकदुम अशरफ शाह के मजार पर मन्नत मानने गए थे और शुक्रवार को ही लौटे थे। ईश मोहम्मद अक्सर इस दरगाह पर जाया करते थे।शनिवार की सुबह उन्होंने गांव की मस्जिद में बकरीद की नमाज़ अदा की और घर लौटकर कुछ देर अकेले बैठे रहे। फिर उठकर वह घर से सटी अपनी झोपड़ी की ओर चले गए, जहां वे अक्सर रहना पसंद करते थे। परिवार को लगा कि वे आराम करने जा रहे हैं, लेकिन थोड़ी देर बाद झोपड़ी से चीख की आवाज़ आई। जब परिजन दौड़कर वहां पहुंचे, तो सामने जो दृश्य था, वह किसी के भी होश उड़ा देने वाला था। झोपड़ी खून से लथपथ थी, पास ही बकरा काटने वाला चाकू पड़ा था और ईश मोहम्मद ज़मीन पर पड़े थे। गर्दन बुरी तरह कटी हुई थी। परिजन उन्हें आनन-फानन में मेडिकल कॉलेज लेकर पहुंचे, जहां से गोरखपुर रेफर कर दिया गया। लेकिन शाम होते-होते ईश मोहम्मद ने दम तोड़ दिया।

इस घटना को और भी गहराई से झकझोर देने वाली बात यह थी कि ईश मोहम्मद एक पत्र छोड़ गए थे। एक मार्मिक आख़िरी चिट्ठी, जिसमें उन्होंने अपनी ‘कुर्बानी’ को अल्लाह के नाम समर्पित बताया। चिट्ठी में लिखा था — “इंसान बकरे को अपने बेटे की तरह पोस कर कुर्बानी करता है। वो भी जीव है, कुर्बानी करना चाहिए। मैं खुद अपनी कुर्बानी अल्लाह के रसूल के नाम से कर रहा हूं। मेरा मिट्टी या कबर घबड़ा के मत करना। कोई मुझको कत्ल नहीं किया है। सकून से मिट्टी देना, किसी से डरना नहीं है। मेरा कबर बास के जगह पर खूंटा है, उसी जगह पर होना चाहिए। मेरा जन्मदिन ता 10/1/66, दिन सोमवार, जनवरी महीना, पुस महीना, समय सुबह का था।”
यह चिट्ठी सिर्फ एक मरते हुए इंसान की आख़िरी बातें नहीं थीं, बल्कि उसकी आत्मा की पुकार, उसकी आस्था का चरम और शायद उसकी तड़प भी थी। लेकिन इस कदम को समाज ने किस रूप में लिया, यही आज की सबसे बड़ी बहस बन गया है।
कुछ मुस्लिम धर्मगुरुओं ने इसे साफ तौर पर आत्महत्या करार दिया है। उनके अनुसार, इस्लाम में आत्महत्या हराम है और अल्लाह के नाम पर जान देना शरिया के खिलाफ है। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि यह धार्मिक उन्माद नहीं, बल्कि मानसिक असंतुलन या फिर गलतफहमी का परिणाम था। लेकिन इसके समानांतर एक तबका ऐसा भी है जो इसे इश्क-ए-इलाही की आख़िरी मंज़िल मान रहा है।जहां इंसान खुद को ही कुर्बान कर देता है।
इस्लामिक जानकार बताते हैं कि बकरीद की कुर्बानी को लेकर सदियों से जो संदेश दिया जाता रहा है वह यह कि अल्लाह को जानवर का मांस नहीं, बल्कि बंदे की नीयत पसंद है। सच्ची कुर्बानी अपने अंदर की बुराइयों, घमंड, लोभ, क्रोध, और अहंकार को अल्लाह की राह में त्याग देना है। ईश मोहम्मद ने शायद इसी को शाब्दिक रूप में ले लिया और खुद को ही कुर्बान कर दिया।
इस पूरे मामले में पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और पत्र की फोरेंसिक जांच की जा रही है। परिजनों से पूछताछ की गई है, लेकिन अब तक किसी भी तरह के पारिवारिक तनाव या विवाद की पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में यह घटना पूरी तरह से आस्था से प्रेरित आत्मबलि मानी जा रही है।
आज जब भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत विश्वास के अधिकार की चर्चा होती है, तब ईश मोहम्मद का यह कदम एक नया प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। क्या धर्म की राह में खुद की बलि जायज़ है? क्या यह बलिदान है या भटकाव?
ईश मोहम्मद नहीं रहे, लेकिन उनकी लिखी हुई चिट्ठी, उनके आख़िरी शब्द और उनका यह फैसला , हमेशा एक बहस का हिस्सा बनकर ज़िंदा रहेंगे। उनका कदम भले ही मुस्लिम समाज में स्वीकृति पाए या नहीं, लेकिन यह जरूर साबित कर गया कि धार्मिक आस्था जब चरम पर पहुँचती है, तो इंसान केवल अपनी आत्मा नहीं, बल्कि अपना शरीर भी समर्पित करने को तैयार हो जाता है।
ईश मोहम्मद ने जो लिखा, उस पर गौर करना आज के समय की जरूरत है। और शायद यही उनका संदेश भी था कि कुर्बानी केवल जानवरों की न हो, बल्कि इंसानियत स्वार्थ और पापों की हो। उन्होंने अपने आख़िरी शब्दों में जो सुकून मांगा है,शायद वही उनके लिए असली मन्नत रही होगी।



