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मानवता के लिये लड़ी गई थी कर्बला की जंग—-

मौहर्रम विशेष

हज़रत मुहम्मद के नवासे (नाती) हज़रत हुसैन व उनके 72 योद्धाओं की शहादत के लिये याद किया जाता है मुहर्रम—

इंग्लिश कैलेंडर ने जिस दिन नवम्बर की 11 तारीख़ दर्शायी थी उसी दिन से मुहर्रम का महीना शुरू हो गया अर्थात उसी दिन मोहर्रम की पहली तारीख़ थी।मोहर्रम का चाँद दिखते ही हमें कर्बला की जंग की ऐतिहासिक तारीख़ याद आ जाती है क्योंकि इसी महीने की 10 तारीख को हज़रत मुहम्मद स.अ. व. के नवासे (नाती) ह. हुसैन ने इंसानियत व हक़ की लड़ाई में अपनी कुर्बानी दी थी।हम बताते चलें की इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना मुहर्रम का महीना है और मुसलमान इस महीने में  खुशी नहीं मानते क्योंकि यह गम का महीना है।जब हम इतिहास के पिछले पन्ने पलटते हैं तो पता चलता है कि इसी महीने की 10 तारीख को  प्रसिद्ध कर्बला की लड़ाई हुई थी जो कि मानवता के लिये ह. मुहम्मद स.अ.व. के नवासे (नाती) हुसैन द्वारा अत्याचारी व अहंकारी शासक यज़ीद के ख़िलाफ़ लड़ी गई थी।इस दिन को आशूरा के नाम से भी जाना जाता है।कर्बला इराक़ के शहर बग़दाद से करीब 100 किमी दूर है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि यह जंग अपने अधिकार या ज़मीनी क्षेत्रफल को बढ़ाने के लिये नहीं लड़ी गई थी बल्कि मानवता व हक़ के लिये लड़ी गई थी। इराक के कर्बला में छिड़ी इस जंग में  ह. हुसैन की सेना में महज़ 72 लोग ही थे जबकि यज़ीद की सेना काफी विशाल थी जिसके सामने ह. हुसैन का पराजित होना तय तय था पर ह. हुसैन ने यज़ीद के सामने घुटने नहीं टेके बल्कि अंतिम दौर तक लड़ाई को अंजाम दिया।इस जंग को पूरी दुनिया ने हक़  व मानवता के लिए लड़ी गई जंग कहा।
कुरआन की एक आयत में कुल चार मुक़द्दस महीने का ज़िक्र है जिसमें एक मोहर्रम महीना भी है।इस मोहर्रम के महीने की 10 वीं तारीख़ काफ़ी ख़ास है क्योंकि कर्बला की इस प्रसिद्ध लड़ाई में मुहर्रम की 10 तारीख को ही मानवता की जंग लड़ते हुए हज़रत हुसैन शहीद हुए थे और अल्लाह ने भी इस दिन बहुत से अम्बियाओं की मदद की थी।इस्लामिक इतिहास में कर्बला में हुई यह  जंग सिर्फ़ जंग ही नहीं बल्कि झूठ पर सच की जीत थी और अहंकार की स्वाभिमान से लड़ाई थी या फिर कह लें कि इंसानियत व हक़ की जंग एक ज़ालिम बादशाह के विरुद्ध थी।संक्षिप्त में हम बताते चलें कि इराक में यज़ीद नाम का बादशाह हुकुमत में था जो कि बड़ा ही अत्याचारी व अहंकारी था।यज़ीद अपने आप को ख़ुदा समझने की भूल करता था और उसने हज़रत हुसैन से कहा कि वह उसकी अधीनता स्वीकार कर लें लेकिन ह.हुसैन ने साफ़ तौर से इससे इनकार कर दिया।फिर जब वहां के लोगों ने इमाम हुसैन को यह खत लिखा कि आप यहां आएं व यज़ीद के ज़ुल्म से छुटकारा दिलाएं तो फिर इस बुलावे को पाकर ईमाम हुसैन अपने 72 साथियों के लश्कर के साथ वहां पहुंच गए और अपना खेमा (डेरा) डाल दिया।ईमाम हुसैन पूरे विश्वास व ढृढ़ निश्चय के साथ इस हक़ की लड़ाई लड़ने को अपने 72 साथियों के साथ खड़े हो गए ।शासक यज़ीद ने हज़रत हुसैन को बहुत से प्रलोभन दिये पर मानवता की लड़ाई में इन्होंने इसे स्वीकार करने से साफ़ इन्कार कर दिया।

      जब यज़ीद ने देखा कि हज़रत हुसैन तो टस से मस नहीं हो रहे हैं तो उसने हज़रत इमाम हुसैन के लश्कर पर ज़ुल्म ढाना शुरू कर दिया।नहर के पानी पर पहरा लगा दिया और मासूमों को तड़पाया।हज़रत हुसैन के टेंट को आग के हवाले कर दिया।फिर मोहर्रम की 10 वीं तारीख को (61 हिज़री) को यज़ीद ने ह. हुसैन के खेमे पर उस वक्त हमला कर  दिया जब वे नमाज़ पढ़ रहे थे।उसने 6 माह के बच्चे से लेकर बड़ों व औरतों  तक पर जुल्म ढाना शुरू कर दिया व हुसैन के छोटे मासूम बेटे अली असगर ने प्यास व भूख से तड़पकर अपने पिता की गोद मे दम तोड़ दिया।इतिहास गवाह है कि कर्बला के मैदान में हुई इस मानवता की लड़ाई में एक तरफ ह.हुसैन की सच्चाई,इंसानियत,सज्जनता व न्याय था तो दूसरी तरफ यज़ीद का अहंकार,झूठ व अत्याचार था।मानवता के लिये लड़ी गई कर्बला की इस ऐतिहासिक लड़ाई में सच के आगे अहंकार व झूट पराजित हुआ।इस मुहर्रम की 10 वीं तारीख़ को सिर्फ़ मुस्लिम वर्ग ही नहीं बल्कि अन्य लोग भी गम मनाते हैं और इस दिन रोज़े भी रखे जाते हैं।जगह जगह ताजियों के साथ जुलूस निकलते हैं व शिया वर्ग ग़म में मातम करता है।लेकिन इस बार कोरोना गाइड लाइन के मद्देनजर जुलूस वग़ैरह पर पाबन्दी है जिस कारण ताज़ियादार व कमेटी के लोग बड़ी ही सादगी से मुहर्रम के त्योहार को मना रहे हैं और ढोल ताशों को बजाने से भी परहेज़ कर रहे हैं।

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