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प्रदेश में पहली बार गांवों में एफ०डी०आर० तकनीक से बन रही सड़कें

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बनाई जा रही सड़कों को एफ डी आर तकनीक से बनाये जाने के सफल प्रयोग के बाद उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री श्री केशव प्रसाद मौर्य ने योजना से सम्बंधित अधिकारियों को निर्देश दिए गए थे कि पी एम जी एस वाई के तहत बनाई जा रही सभी सड़कों का निर्माण एफ डी आर तकनीक से ही किया जाय, इसके बहुत ही सार्थक व सकारात्मक परिणाम निखर कर आये हैं।

क्या है एफ डी आर तकनीक

प्रदेश में पहली बार एफ०डी०आर० तकनीक के द्वारा पूर्व से बनी सड़कों के क्रस्ट में उपलब्ध पुरानी गिट्टी को ही सीमेन्ट और विशेष प्रकार के आई०आर०सी० एक्रीडेटेड स्टेब्लाईजर को विशेष मशीनों से रिक्लेम एवं मिश्रित करते हुये सड़कों का निर्माण कराया जा रहा है। एफ०डी०आर० मार्गों का डिजाइन एवं टेस्टिंग आई०आई०टी०, सी आर आर आई,एन०आई०टी० से किया जा रहा है। इस तकनीक पर आधारित निर्माण होने पर बिना नयी गिट्टी लाये हुए पुरानी गिट्टी का प्रयोग कर सड़क बनायी जा रही है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों का दोहन अत्यधिक कम हो रहा है, तथा इससे कार्बन फुट प्रिन्ट में अत्यधिक कमी हो रही है। इस तकनीक से निर्मित मार्गों के निर्माण में कम लागत से अत्यधिक मजबूत व टिकाऊ एवं शीघ्रता से मार्गों का निर्माण हो रहा है।

उत्तर प्रदेश  एफ०डी०आर० तकनीकी पर ग्रामीण मार्गों के निर्मित करने में अग्रणी भूमिका में है, पी आर आर डी ए के मुख्य कार्यपालक अधिकारी श्री अखण्ड प्रताप सिंह ने बताया उत्तर प्रदेश  एफ०डी०आर० तकनीकी पर ग्रामीण मार्गों के निर्मित करने में अग्रणी भूमिका में है तथा इस तकनीकी को अन्य राज्यों में लागू करने हेतु कार्यशाला एवं फील्ड ट्रेनिंग उ०प्र० द्वारा बिहार, राजस्थान, त्रिपुरा, मणीपुर, आन्ध्र प्रदेष, पंजाब, पश्चिम बंगाल, झारखण्ड, उड़ीसा, मध्य प्रदेष, नागालैण्ड, मेघालय, असम को दी जा चुकी है। अन्य राज्यों को भी एफ०डी०आर० तकनीक का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

इस तकनीक से मार्गों का निर्माण कराने में  होने वाले लाभ’

यूपी आर आर डी ए में राज्य गुणवत्तायुक्त समन्वयक के रूप में कार्य कर रहे श्री बी के दुबे व राज्य तकनीकी अधिकारी के रूप में कार्य कर रहे श्री डी डी पाठक ने बताया कि उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण सड़क अभिकरण का मानना है कि इस तकनीक से निर्माण कराने में मार्ग के बेस के निर्माण करने में नई पत्थर की गिट्टियों की बचत हो जाती है ,जिससे पर्यावरण की अत्यधिक सुरक्षा हो जाती है। सामान्यतया 5.5 मीटर चौडाई के मार्गों के इस तकनीक पर आधारित निर्माण कराने में प्रति किलोमीटर 2400 घन मीटर (लगभग 150 ट्रक) नई पत्थर की गिट्टियों की बचत होती है जो पर्यावरण संरक्षण में एक बहुत बड़ी उपलब्धि होती है।नई पत्थर की गिट्टियों के बचत होने से गिट्टियों की तुड़ाई तथा उनकी ढुलाई में लगने वाले डीजल जो लगभग 13000 लीटर प्रति किलोमीटर लग जाता है से बचत हो जाती है जिससे कार्बन फुटप्रिंट में अत्यधिक कमी होती है।नई पत्थर की गिट्टियों की ढुलाई में पूर्व से स्थित सड़के भी क्षतिग्रस्त हो जाती हैं।

इस प्रकार इस तकनीक के प्रयोग से इनकी भी बचत हो जाती है।इस तकनीक में एक पउचमतउमंइसम इेंम का निर्माण हो जाता है, जिसके कारण सामान्यतया नमी के कारण होने वाले मार्ग की क्षति में अत्यधिक कमी हो जाती है। पारंपरिक तकनीक के निर्माण की तुलना में इस तकनीक से निर्माण कराने में सामान्यतया 10 से 15 प्रतिशत लागत में भी बचत होती है। इस तकनीक से निर्माण में मार्ग का निर्माण भी तीव्र गति से होता है। प्रारंभ में इस तकनीक के निर्माण में जॉब मिक्स फार्मूला एवं ट्रायल स्ट्रेच के निर्माण में लगभग 5 माह का समय लग जाता है, परंतु उसके पश्चात इस तकनीक से 600 मीटर से 1 किलोमीटर लंबाई तक प्रतिदिन एफ डी आर बेस का निर्माण हो जाता है। इस तकनीक से निर्मित बेस के ऊपर एक दिन के बाद हल्के वाहनों के परिचालन की अनुमति दी जा सकती है परंतु भारी वाहनों का परिचालन 7 से 8 दिन के बाद ही हो सकता है। यू कि इस तकनीक से निर्मित बेस के मजबूती के किए गए परीक्षण के अनुसार इन मार्गों की आयु भी 15 से 20 वर्ष तक अनुमानित है।

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