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भूगर्भ जल सप्ताह: रंग लाई सीएम योगी की जल संरक्षण की मुहिम

  • अमृत सरोवरों के लिहाज से उत्तर प्रदेश देश में नंबर वन
  • लक्ष्य से तीन गुना सरोवरों का हुआ निर्माण
  • वर्षों से गोरखनाथ मंदिर में होता है आधुनिक तकनीक से होता है जल संरक्षण

लखनऊ। बारिश का हर बूंद बचाना योगी सरकार का लक्ष्य है।यह पानी की महत्ता और इसके दुरुपयोग (खेती में) को देखते हुए जरूरी भी है। जल संरक्षण मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की निजी रुचि का विषय भी रहा है। लोगों को जल संरक्षण के प्रति जागरूक करने और मानसून के इस सीजन में जितना संभव हो उतना पानी भूगर्भ में संचित करने के लिए उनकी सरकार भूगर्भ जल सप्ताह (16 से 22जुलाई) मना रही है। योगी की निजी रुचि और जलसंरक्षण के प्रति उनकी निजी रुचि के नाते उत्तर प्रदेश में इस संबंध में कमाल का काम भी हुआ है। आंकड़े और सम्मान इस बात के प्रमाण हैं।  मिशन अमृत सरोवर के आंकड़े के अनुसार, वर्ष 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर शुरू इस योजना के तहत लक्ष्य से तीन गुना अधिक अमृत सरोवरों की नए सिरे से खोदाई या पुराने सरोवरों को पुनर्जीवन देकर उत्तर प्रदेश देश में नंबर एक है।

योजना के तहत हर जिले में ऐसे 75/75 सरोवरों के निर्माण का लक्ष्य था। उत्तर प्रदेश में मूल जिलों की संख्या 74 है। इस तरह लक्ष्य के सापेक्ष यहां 5550 सरोवरों का निर्माण होना था, पर निर्मित सरोवरों की संख्या रही 16630। यह लक्ष्य की अपेक्षा तीन गुने से अधिक है। दूसरे स्थान पर आने वाला मध्य प्रदेश 5839 सरोवरों के साथ बहुत पीछे है। योजना के तहत अन्य राज्यों में निर्मित सरोवरों की संख्या इस प्रकार है, छत्तीसगढ़ 2902, बिहार 2613, हरियाणा 2088, झारखंड 2048, पंजाब 1450।

जल संरक्षण की अन्य योजनाएं

यह तो जल संरक्षण की मात्र एक योजना की प्रगति है। दरअसल निजी रुचि की वजह से मार्च 2017 में मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने जल संरक्षण के लिए कई योजनाएं बनाईं। मसलन खेत तालाब योजना,  लुप्त प्राय हो चुकी नदियों को पुनर्जीवन, आधे से कम पानी में भी सिंचाई की दक्ष विधाओं स्प्रिंकलर और ड्रिप इरीगेशन को बढ़ावा देना तथा भवन निर्माण के लिए जल संरक्षण की व्यवस्था को अनिवार्य करना, नदियों के किनारे बहुउद्देशीय तालाबआदि।

अब तक निर्मित हो चुके हैं 37403 खेत तालाब

खेत तालाब योजना के तहत 2017-18 से अब तक 37403 तालाबों का निर्माण हो चुका है। सरकार इनकी खोदाई की लागत पर 50 फीसद तक अनुदान देती है। व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए आवेदन के समय एक हजार रुपए टोकन मनी जमा करने से लेकर अनुदान तक की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन है। इसकी पात्रता के लिए सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली (माइक्रो इरिगेशन सिस्टम) की स्थापना को भी अनिवार्य किया गया है। इसी तरह योगी सरकार लुप्त प्राय हो गई नदियों को भी जनसहयोग से पुनर्जीवन दे रही है। हर जिलाधिकारी को निर्देश है कि वह अपने जिले की कम से कम एक नदी को पुनर्जीवित करें।

ड्रिप सिंचाई को बढ़ावा दे रही सरकार

कम पानी में अधिक सिंचाई के लिए सरकार ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी अपेक्षाकृत सिंचाई की दक्ष विधाओं को प्रोत्साहन दे रही है। वे ब्लॉक जहां पिछले 10 वर्षों से भूजल स्तर सामान्य से नीचे है, ऐसे इलाकों के एक चौथाई से अधिक किसानों तक सिंचाई की ड्रिप और स्प्रिंकलर तकनीक से संतृप्त करने की है। एक्सपर्ट्स के अनुसार ड्रिप-स्प्रिंकलर से पारंपरिक सिंचाई की तुलना में 40 से 80% पानी कम खर्च होता है। खेत नमी से बराबर से संतृप्त होता है। लिहाजा बीज का अंकुरण बेहतर होता है। इसका असर उपज पर भी पड़ता है। सिंचाई की परंपरागत विधा से खेत की सतह के अनुसार कहीं कम और कहीं अधिक पानी लगने से फसलों को होने वाली क्षति भी नहीं होती। इससे कम पानी लगने के बावजूद फसलों की उत्पादकता में 40-45% तक वृद्धि देखी गई है। ड्रिप और स्प्रिंकलर इरिगेशन के लिए सरकार सीमांत किसानों को मिलती है 90% तक की सब्सिडी देती है।

दिखने लगे हैं नतीजे

जल संरक्षण के बाबत योगी सरकार द्वारा किए गए समग्र प्रयास के नतीजे भी दिखने लगे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश के 29 जिलों के भूजल स्तर में सुधार आया है। अत्यधिक भूजल दोहन वाले ब्लाकों की संख्या 82 से घटकर 50 रह गई है। बुंदेलखंड के महोबा, ललितपुर एवं चित्रकूट में बोरिंग से पानी नहीं निकलता था, अब तालाब के पास खुदाई करते ही पानी मिल जाता है।

गोरखनाथ मंदिर में इस तरह होता है जल संरक्षण*
उल्लेखनीय है कि जल संरक्षण मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की निजी रुचि का विषय रहा है। उनका गृह जनपद गोरखपुर तराई के इलाके में आता है। यहां भरपूर बारिश होती है। लिहाजा जल संरक्षण के बारे में विरले ही सोचते हैं। करीब एक दशक या इससे पहले गोरखनाथ मंदिर जिससे जुड़े गोरक्षपीठ के वे पीठाधीश्वर भी हैं, वहां मंदिर परिसर में उन्होंने उस समय जल संरक्षण के लिए अत्याधुनिक तकनीक से परिसर में जलजमाव वाली चार जगहों को चिन्हित कर वहां 10 फीट लंबा, 9 फीट चौड़ा और 10 फीट गहरा गड्ढा खुदवाया था। इसमें 10 फीट की गहराई तक बोरिंग कराई गई। गड्ढे के सतह से लेकर ऊपर तक मानक मोटाई में क्रमशः महीन बालू, मोरंग बालू, ईट और पत्थर के टुकड़े भरे गए। टैंक में आने वाला पानी शुद्ध हो इसके लिए पहले इसे एक चैंबर में एकत्र किया गया। चैंबर की जो दीवार मुख्य टैंक की ओर थी उस पर प्लास्टिक की मजबूत जाली लगाई गई। पानी इससे निथरने के बाद 8 इंच मोटी प्लास्टिक की पाइप के जरिये टैंक में जाता है।

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