उत्तर प्रदेशराज्यलखनऊ

स्वधर्म स्वदेश स्वराज्य हमारे स्वबोध की प्रेरणा: स्वान्त रंजन

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के युवा शोधार्थी आयाम की ओर से शनिवार को लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में ‘आत्मबोध से विश्वबोध’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर बोलते मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख स्वान्त रंजन ने कहा कि स्वधर्म, स्वदेश और स्वराज्य हमारे स्वबोध की प्रेरणा है। इसके आधार पर ही महापुरूषों व क्रान्तिकारियों ने समाज जागरण करने का काम किया। उन्होंने कहा कि देश में राष्ट्रभाव को कमजोर करने,एकात्मभाव कैसे बिखर जाय व धर्म के आधार पर देश में जो एकसूत्रता है उसको विखण्डित करने का प्रयत्न योजनाबद्ध ढ़ंग से किया गया। अंग्रेजों ने जानबूझकर भारत के इतिहास को विकृत करना प्रारम्भ किया। जो कभी भारत आये नहीं ऐसे तथाकथित इतिहासकारों से भारत का इतिहास लिखवाया गया।

स्वान्त रंजन ने कहा कि संस्कृति राष्ट्र की आत्मा होती है। देश को एकजुट रखने में संस्कृति महत्वपूर्ण कड़ी है। अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख ने कहा कि लगातार इस्लामिक आक्रमणों के कारण हिन्दू समाज आत्मविस्मृत हो गया था। समाज आत्मकेन्द्रित हो गया था। ऐसे समय में डा.केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। स्व का विचार करते हुए सामाजिक समरसता के आधार पर सभी जाति वर्ग को सशक्त करना है। अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डा. पवनपुत्र बादल ने कहा कि सनातन परम्परा के विचारों को हम जीते हैं। उन्होंने कहा कि भारत की पूरी साहित्य परम्परा में भारत बोध है। वसुधैव कुटुम्बकम और सर्वे भवन्तु सुखिन: भारतबोध में है।

पवनपुत्र बादल ने कहा कि भारत के भाव बोध को समझने की आवश्यकता है। भारत की ज्ञान परम्परा विमर्श से आगे आयी है। उन्होंने बताया कि अखिल भारतीय परिषद भारत की सभी भाषाओं में काम करती है। भारत की भाषा देश को एकात्म करती है। हम अपनी भाषा व बोली को पकड़कर रखें,उससे जुड़ाव महसूस करें। अपने मूल को न छोड़ें। आत्मबोध से विश्वबोध आवश्यक है।

बावन मंदिर अयोध्या के महंत वैदेही वल्लभ शरण महराज ने कहा कि आत्मबोध से विश्व बोध होगा। उन्होंने कहा कि भारत का साहित्य ही सर्वश्रेष्ठ है। हमारा ज्ञान अलौकिक है। भारत विश्वगुरू था,है और रहेगा। महंत वैदेही वल्लभ शरण ने कहा कि अयोध्या चीख चिल्ला नहीं रही है। मोदी व योगी के शासनकाल में मण्डन करती हुई व विकास करती हुई अयोध्या आज दिख रही है।  भव्यता व दिव्यता के साथ रामलला विराजमान हैं। अयोध्या में संपूर्ण जाति के मंदिरों का कायाकल्प हुआ है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुशील चन्द्र त्रिवेदी ने कहा कि हम पराधीनता के काल में थोपे हुए साहित्य व विज्ञान को पढ़ते हैं। भारत को जानने के लिए भारत के आर्षग्रन्थों को पढ़ना होगा।

कार्यक्रम का संचालन युवा शोधार्थी आयाम के प्रमुख आदर्श सिंह ने किया। आभार अखिल भारतीय साहित्य परिषद के प्रान्तीय अध्यक्ष विजय त्रिपाठी ने व्यक्त किया।

इस अवसर पर सामाजिक समरसता गतिविधि के प्रान्त प्रमुख राजकिशोर,सह विभाग कार्यवाह ब्रजेश पाण्डेय,साहित्य परिषद के प्रान्तीय महामंत्री द्वारिका प्रसाद रस्तोगी,सह महामंत्री डा.बलजीत श्रीवास्तव,लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के विभागाध्यक्ष डा.सौरभ मालवीय,डा.अमित कुशवाहा,श्याम त्रिपाठी,प्रो.श्यामलेश व शरद मिश्र समेत बड़ी संख्या में छात्र —छात्राएं उपस्थित रहीं।

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