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सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार अधिनियम की धारा 17A की वैधता पर सुनाया खंडित फैसला, जानें जजों की राय

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने लोकसेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच शुरू करने से पहले अनुमति लेने से संबंधित, भ्रष्टाचार रोधी कानून की 2018 की धारा की संवैधानिक वैधता पर मंगलवार को खंडित निर्णय सुनाया। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए असंवैधानिक है और इसे रद्द किया जाना चाहिए जबकि न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन ने धारा को संवैधानिक मानते हुए ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा की जरूरत पर जोर दिया।

साल 2018 में जोड़ी गई भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17ए के तहत सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना किसी लोकसेवक पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। उच्चतम न्यायालय ने गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ‘सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन’ (सीपीआईएल) की जनहित याचिका (पीआईएल) पर यह निर्णय सुनाया है, जिसमें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संशोधित धारा 17ए की वैधता को चुनौती दी गई थी।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि पूर्वानुमति की आवश्यकता भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के विरुद्ध है; इससे जांच में रुकावट आती है और भ्रष्ट अधिकारियों को बचने का मौका मिल जाता है। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कहा, “धारा 17ए असंवैधानिक है और इसे रद्द किया जाना चाहिए। जांच शुरू करने से पहले किसी तरह की पूर्व अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। पूर्व मंजूरी की शर्त अधिनियम के उद्देश्य के खिलाफ है। इससे जांच में रुकावट आ सकती है और ईमानदार अधिकारियों के बजाय भ्रष्ट लोकसेवकों को संरक्षण मिलता है।”

वहीं, न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने कहा, “धारा 17ए संवैधानिक रूप से वैध है, बशर्ते मंजूरी देने का फैसला लोकपाल या राज्य का लोकायुक्त करे। इस प्रावधान से ईमानदार अधिकारियों की रक्षा होगी और भ्रष्ट लोगों के लिए सजा सुनिश्चित होगी। इससे प्रशासनिक व्यवस्था में देश की सेवा के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रतिभावान व्यक्तियों को आकर्षित करने में मदद मिलेगी।”

अब यह मामला भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष रखा जाएगा, ताकि एक बड़ी पीठ का गठन कर इस पर अंतिम निर्णय लिया जा सके। पीठ ने कहा, “हमारे अलग-अलग मतों को देखते हुए रजिस्ट्री को निर्देश दिया जाता है कि इस मामले को प्रधान न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए, ताकि उपयुक्त पीठ का गठन करके इससे जुड़े मुद्दों पर नए सिरे से विचार किया जा सके।”

एनजीओ की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि यह प्रावधान भ्रष्टाचार विरोधी कानून को कमजोर करता है, क्योंकि सरकार से अक्सर मंजूरी नहीं मिलती, जबकि वही इस कानून के तहत ‘सक्षम प्राधिकारी’ है। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में पक्ष रखा।

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