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राज करना इस देश के लोगों के खून में नहीं, अंग्रेजों ने भरे कई झूठ; मोहन भागवत ने समझाया

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने अंग्रेज शासकों पर सच्चाई को छुपाने और देश के लोगों के दिमाग में कई झूठ भरने के आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने भारत के ऐतिहासिक दृष्टिकोण को जानबूझकर गलत तरीके से पेश किया। भागवत ने कहा कि ऐसा भारतवासियों की स्वशासन की क्षमता को कमजोर करने के उद्देश्य से किया गया। सोमलवार एजुकेशन सोसाइटी के 70वें स्थापना दिवस के अवसर पर नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में भागवत ने कहा कि भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के बावजूद देशवासी आक्रमणकारियों के खिलाफ एकजुट रहे।

भागवत ने कहा, “1857 में भारत के ब्रिटिश शासकों को एहसास हुआ कि असंख्य जातियों, संप्रदायों, भाषाओं, भौगोलिक असमानताओं और भारतीयों के आपस में लड़ने के बावजूद, वे तब तक एकजुट रहते हैं जब तक कि वे देश से विदेशी आक्रमणकारियों को बाहर नहीं निकाल देते।” आरएसएस प्रमुख ने कहा, “ब्रिटिश शासकों ने कुछ ऐसा करने का फैसला किया जिससे भारतीयों की यह आदत खत्म हो जाए ताकि ब्रिटिश शासन हमेशा कायम रहे। उनका उद्देश्य भारतीयों को उनके इतिहास, पूर्वजों और गौरवशाली विरासत को भूलने पर मजबूर करना था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए, अंग्रेजों ने तथ्यों की आड़ में हमारे दिमाग में कई झूठ भर दिए।”

भागवत ने कहा, “सबसे बड़ा झूठ यह है कि भारत में ज्यादातर लोग बाहर से आए हैं। ऐसा ही एक झूठ यह है कि भारत पर आर्यों ने आक्रमण किया था, जिन्होंने द्रविड़ों से लड़ाई की थी। उन्होंने यह प्रचार किया कि भारतीयों के खून में अकेले शासन करना नहीं है और यहां के लोग धर्मशालाओं में रहने वालों की तरह रहते हैं। वो कहते हैं कि हमारे देश का इतिहास ऐसा है कि कोई बाहर से आया, यहां के लोगों को मारा-पीटा और खुद राजा बन गया। राज करना इस देश के लोगों के खून में नहीं है, वो ऐसे हैं जैसे कोई धर्मशाला में रहने आए हों। उन्होंने अपनी ताकत और हमारी अज्ञानता के कारण हमारे दिमाग में ये झूठ भर दिया। इस थ्योरी को पूरी दुनिया में नकार दिया गया है, कोई इस पर यकीन नहीं करता और इसके बहुत सारे सबूत भी हैं। लेकिन लोगों के दिमाग से इसे निकलने में अभी भी समय लग रहा है।”

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए भागवत ने 21वीं सदी में शिक्षकों की महत्ता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि तकनीक से भले ही जानकारी प्राप्त की जा सकती है, लेकिन उस जानकारी का सही इस्तेमाल कैसे करना है, यह सिखाने में शिक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। उन्होंने इतिहास में फैलाई गई गलत धारणाओं को चुनौती देने के लिए सूचनाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन करने की आवश्यकता पर बल दिया। महात्मा गांधी का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि विज्ञान में नैतिकता का होना अत्यावश्यक है।

भागवत ने तकनीक के लाभों पर चर्चा करते हुए कहा कि यह सटीकता और गति को बढ़ाती है, लेकिन इसके जिम्मेदार उपयोग की समझ मनुष्यों के विवेक पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि सच्ची शिक्षा वही है जो चरित्र का निर्माण करती है और समाज के प्रति योगदान देती है।

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