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एकनाथ शिंदे : गरीबी ने पढ़ने नहीं दिया, मजबूरी में चलाना पड़ा ऑटो, फिर एक ड्राइवर को मिली महाराष्ट्र चलाने की जिम्मेदारी

एक गरीब लड़का, जिसकी गरीबी ने उसे पढ़ने नहीं दिया और मजबूरी इतनी कि परिवार का पेट भरने के लिए खुद ऑटो रिक्शा चलाना पड़ा, एक दिन जब महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बना तो वह दिन उस परिवार के लिए होली-दीपावली से भी कहीं बढ़कर रहा। भले मुख्यमंत्री बनने की कहानी महाराष्ट्र की राजनीति में जोड़-तोड़ से शुरू हुई थी, लेकिन एक कट्टर शिवसैनिक की यह लंबे राजनीतिक जीवन की मेहनत थी। बात हो रही है महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की।

9 फरवरी 1964 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में जन्मे एकनाथ शिंदे का नाता गरीब परिवार से था। ऐसे में पढ़ाई उनके लिए बेहद मुश्किल थी। गरीबी में पढ़ाई छूटने पर जीवनयापन के लिए उन्हें ऑटो भी चलाना पड़ा।

शिंदे कहते हैं, “ऑटो रिक्शा चालक के समय की जिंदगी से मैंने सीखा कि कोई भी काम मिले, उसे ईमानदारी से किया जाए।”

एकनाथ शिंदे की दिलचस्पी धीरे-धीरे राजनीति में होने लगी थी। 1980 के दशक में जब उम्र 18 साल थी, तब सतारा की राजनीति में आनंद दीघे का वर्चस्व था। वह शिवसेना के लिए एक तरह से ठाणे में प्रमुख जड़ थे, लेकिन शिंदे ने शिवसेना के साथ जुड़कर राजनीति का सफर शुरू कर दिया था। शिंदे के लिए आनंद दीघे उनके ‘राजनीति गुरु’ बन चुके थे। इस आम कार्यकर्ता को राजनीति में पहचान बनानी थी और इसके लिए उन्होंने शिवसेना का एक भी प्रदर्शन नहीं छोड़ा, जहां वे खुद पार्टी नेताओं के साथ खड़े नजर नहीं आए।

शिंदे ने एक इंटरव्यू में कहा, “मैंने सोशल वर्क से राजनीति की शुरुआत की। बाला साहेब ठाकरे हों या हमारे गुरु आनंद दीघे, वे मुझे जिम्मेदारी देते थे और मैं वह बखूबी निभाता था। मैं इतनी मेहनत करता था कि जो हमें चाहिए था, वह हासिल होता था।”

उनकी राजनीतिक शुरुआत इस कदर शुरू हुई थी कि खुद गणेश उत्सव पर गड्ढे खोदकर मंडप बनाया करते थे। लोगों के बीच सेवा भाव ने उन्हें राजनीति के लिए और बेहतर विकल्प दे दिया था। फिर प्रदर्शनों में भागीदारी ने शिंदे को पार्टी नेताओं के बीच हल्की पहचान से उनका परिचय करा दिया था।

1997 में एकनाथ शिंदे को वह मौका भी मिला, जिसकी तलाश में वे निकले थे। यह राजनीति जीवन में उनके नए दौर की शुरुआत थी। शिवसेना ने शिंदे को ठाणे महानगर पालिका के लिए अपना प्रत्याशी चुना था और पार्टी के इस भरोसे को एकनाथ शिंदे ने अपनी मेहनत से टूटने नहीं दिया। वे भारी मतों से चुनाव में जीते। 2001 में उन्हें नगर निगम में विपक्ष के नेता के रूप में जिम्मेदारी मिली।

शिवसेना में उनकी काफी अच्छी पकड़ बनी रही और कट्टर शिवसैनिक होने की छवि ने उन्हें अधिक अवसर दिलाए। अब पार्षद से आगे बढ़ने के सपने थे। पार्टी ने कुछ सालों के बाद 2004 में शिंदे को फिर से एक मौका दिया। इस बार उन्हें विधानसभा चुनाव के लिए टिकट मिला था। शिंदे ने शिवसेना के इस भरोसे को भी बनाए रखा और ठाणे से जीतकर विधानसभा तक का सफर तय कर लिया। शिवसेना में अब उनका कद बढ़ चुका था और यहां तक कि शिंदे के हाथ में बड़ी जिम्मेदारी आ चुकी थी कि वे 2014 में नेता प्रतिपक्ष चुने गए और अगले ही साल भाजपा-शिवसेना गठबंधन की सरकार में वे मंत्री चुन लिए गए।

एक वह दिन आया, जब राजभवन में एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे। इसके पीछे बगावत थी, जो उद्धव ठाकरे सरकार के तख्तापलट के साथ अपने अंजाम तक पहुंच चुकी थी।

महाराष्ट्र में शिवसेना की कल्पना कभी ठाकरे परिवार से अलग होकर नहीं की जा सकती थी। उसी शिवसेना में ठाकरे परिवार के खिलाफ न सिर्फ एकनाथ शिंदे खड़े हुए, बल्कि अधिकतर विधायकों को अपने साथ लाकर पूरी पार्टी अपने कब्जे में ले ली।

तख्तापलट का यह राजनीति खेल भाजपा-शिवसेना के बीच कुर्सी की लड़ाई से शुरू माना जाता है, क्योंकि विधानसभा चुनाव में दोनों दलों ने मिलकर जीत हासिल की, लेकिन जीत के बाद उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए अड़ गए। यहां तक कि उन्होंने भाजपा का साथ छोड़कर कांग्रेस पार्टी, जिसके खिलाफ शिवसेना जिंदगीभर लड़ती रही, उससे हाथ मिला लिया और मुख्यमंत्री बन गए।

कुछ महीनों बाद एकनाथ शिंदे ने कई विधायकों को साथ लेकर न सिर्फ उद्धव ठाकरे की कुर्सी छीनी, बल्कि उन्हें असली शिवसेना से भी बाहर कर दिया।

शिंदे जब भाजपा के साथ वापस लौटकर आए थे, तब उम्मीद यही थी कि मुख्यमंत्री भाजपा से होगा, लेकिन देवेंद्र फडणवीस की घोषणा ने सभी को चौंका दिया था, क्योंकि उन्होंने एकनाथ शिंदे के लिए वह कुर्सी दे दी। इसके साथ ही शिंदे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने। दूसरी बार भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने पर उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया गया।

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