पंजाबराज्य

पंजाब सीयू में ‘पत्रकारिता में एआई’ विषयक एआई इम्पैक्ट प्री-समिट का आयोजन

बठिंडा: पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय द्वारा इंडिया एआई मिशन के अंतर्गत पत्रकारिता में ए.आई.” विषय पर एक दिवसीय एआई इम्पैक्ट प्री-समिट का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के आमंत्रित वक्ता तुषार शर्मा, संपादक, द डेली गार्जियन रहे। इस कार्यक्रम में शिक्षाविदों, मीडिया पेशेवरों और विद्यार्थियों ने भाग लेकर पत्रकारिता, शिक्षा और समाज में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की परिवर्तनकारी भूमिका पर विचार-विमर्श किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. राघवेंद्र प्रसाद तिवारी ने कहा कि आज एआई हमारे जीवन के लगभग हर क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है और लोगों की ज़रूरतों के अनुसार बदलाव ला रहा है। उन्होंने भारत सरकार की एआई आधारित पहलों का उल्लेख करते हुए कृषि और स्वास्थ्य विज्ञान में एआई के उपयोग की चर्चा की।

कुलपति ने एआई के माध्यम से शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की विश्वविद्यालय की परिकल्पना साझा की और मूल्यांकन, अध्यापन-अधिगम प्रक्रिया तथा विद्यार्थियों की सीखने की प्रवृत्तियों को समझकर आवश्यक शैक्षणिक सहयोग देने वाली एआई-आधारित शिक्षण पद्धति के विकास पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि एआई सतत विकास और डेटा-आधारित प्रभावी निर्णयों में अहम भूमिका निभा सकता है, लेकिन यह भी आवश्यक है कि एआई मानव सोच पर हावी न हो और इसके उपयोग में नैतिकता तथा मानवीय विवेक सदैव केंद्र में रहें।

तुषार शर्मा ने आधुनिक न्यूज़रूम में एआई के व्यावहारिक उपयोग पर एक ज्ञानवर्धक व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि एआई में बुद्धिमत्ता तो है, लेकिन चेतना नहीं, इसलिए मानवीय निगरानी अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने यह भी बताया कि एआई टूल्स का नैतिक रूप से उपयोग करते हुए पत्रकार किस प्रकार रिपोर्टिंग, सार-संक्षेपण, बैकग्राउंड ब्रीफ तैयार करने, समाचार लेखन एवं संपादन, डेटा माइनिंग, खोजी पत्रकारिता, बजट विश्लेषण, साक्षात्कारों के ट्रांसक्रिप्शन तथा रियल-टाइम लेख प्रकाशन में सहायता ले सकते हैं।

इसके साथ ही, शर्मा ने एआई पर अंधा भरोसा न करने की सलाह देते हुए कहा कि एआई के परिणामों में गलत जानकारी, पक्षपात और तथ्यात्मक त्रुटियाँ हो सकती हैं, विशेष रूप से लिंग, धर्म, जाति और संघर्ष जैसे संवेदनशील विषयों की रिपोर्टिंग के दौरान। उन्होंने कहा कि एक भी तथ्यात्मक गलती पत्रकार की विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचा सकती है, इसलिए एआई से तैयार किसी भी सामग्री का उपयोग पूर्ण पारदर्शिता और कड़े सत्यापन के साथ किया जाना चाहिए।

उन्होंने दोहराया कि पत्रकारिता केवल लिखने या टाइप करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सोच, मौलिकता, नैतिक विवेक और पंक्तियों के बीच छिपे अर्थ को समझने की मानवीय क्षमता पर आधारित पेशा है, और इसी कारण संपादक एआई से लिखी गई सामग्री को आसानी से पहचान सकते हैं। उन्होंने अपने संबोधन का समापन करते हुए कहा कि एआई पत्रकारों की मदद का एक साधन है, न कि मानवीय विवेक और ज़िम्मेदारी का विकल्प।

कार्यक्रम की शुरुआत जनसंचार एवं मीडिया अध्ययन विभाग के अध्यक्ष डॉ. रुबल कनोज़िया के स्वागत संबोधन से हुई, जिसमें उन्होंने “एआई इन जर्नलिज़्म” विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए मीडिया शिक्षा और न्यूज़रूम कार्यप्रणाली में एआई की भूमिका पर बात की तथा अतिथि वक्ता का परिचय कराया। कार्यक्रम का समापन डॉ. किंशुक पाठक, एसोसिएट प्रोफेसर, के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। इस अवसर पर विभाग के संकाय सदस्य डॉ. छवि गर्ग, डॉ. महेश मीणा, डॉ. अलीम खान और डॉ. विष्णु तथा विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी श्री रॉबिन जिंदल भी उपस्थित रहे। विद्यार्थियों ने भी संवाद सत्र में सक्रिय भागीदारी की और पत्रकारिता में एआई के नैतिक व प्रभावी उपयोग को लेकर अपने प्रश्न और विचार साझा किए।

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