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प्रयागराज : बालगृह में रहने वाले नाबालिगों के विवरण में जाति और धर्म के उल्लेख पर हाईकोर्ट ने जताई कड़ी आपत्ति

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्चों को राजकीय बालगृह में रखे जाने के दौरान उनके अभिलेखों में जाति एवं धर्म के उल्लेख के मुद्दे पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए उत्तर प्रदेश महिला कल्याण निदेशालय के निदेशक और सचिव से यह पूछा था कि क्या राजकीय बालगृह में रह रहे नाबालिगों के परामर्शदाताओं और जिला परिवीक्षा अधिकारी के कार्यालय द्वारा तैयार किए गए अभिलेखों में जाति और धर्म का उल्लेख आवश्यक है।

इस विषय पर कोर्ट ने पूर्व में पारित आदेशों के आलोक में महिला कल्याण निदेशालय और राज्य सरकार के अधिकारियों से विस्तृत स्पष्टीकरण तलब किया। निदेशक एवं सचिव, महिला कल्याण, उत्तर प्रदेश को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित होकर न्यायालय की सहायता करने का निर्देश दिया गया। राज्य सरकार की ओर से अवगत कराया गया कि विभागीय अभिलेखों में संकलित जानकारी गोपनीय रखी जाती है और उसका उपयोग केवल पुनर्वास उद्देश्यों के लिए किया जाता है। सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता ने कोर्ट को यह भी बताया कि भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के सचिव को, किशोर न्याय (देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 और किशोर न्याय नियम, 2016 के संबंधित प्रावधानों में संशोधन के लिए सुझाव देते हुए पत्र लिखा गया है।

बता दें कि नाबालिग सुनीता व अन्य द्वारा दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने बाल गृह में रखे जाने वाले नाबालिगों के विवरण में जाति एवं धर्म के उल्लेख पर कड़ी आपत्ति जताते हुए सरकार व आयोग से जवाब तलब किया था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि नाबालिग को विपक्षियों की अवैध अभिरक्षा में रखा गया है। सुनवाई के दौरान कोर्ट के पूर्व आदेशों के अनुपालन में नाबालिग को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया। कोर्ट ने यह पाया कि बालिका को कौशल उन्नयन, परामर्श एवं मनोवैज्ञानिक सहायता की आवश्यकता है, जिससे वह अपने भविष्य के संबंध में उचित निर्णय ले सके। इस संबंध में जिला प्रोबेशन अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर ‘इंडिविजुअल केयर प्लान’ प्रस्तुत करने के निर्देश भी दिया गया।

मामले की अंतिम सुनवाई यानी 3 फरवरी 2026 को राज्य की ओर से यह सूचित किया गया कि नाबालिग वर्तमान में अपने भाई की सुरक्षित अभिरक्षा में है, साथ ही राज्य सरकार द्वारा अधिनियम, 2015 तथा नियम, 2016 में संशोधन हेतु सुझाव केंद्र सरकार को प्रेषित किए जाने की जानकारी भी दी गई। उपरोक्त परिस्थितियों के मद्देनजर कोर्ट ने माना कि अब याचिका लंबित रखने का कोई औचित्य नहीं है। अतः याचिका को निस्तारित कर दिया। गौरतलब है कि कोर्ट ने इससे पूर्व अपने आदेशों में जातिगत महिमामंडन को ‘राष्ट्र-विरोधी’ बताया था और वंश के बजाय संविधान के प्रति श्रद्धा की भावना को ‘देशभक्ति का सर्वोच्च रूप’ और ‘राष्ट्रीय सेवा की सच्ची अभिव्यक्ति’ के रूप में परिभाषित किया था। इसके साथ ही प्रदेश सरकार को एफआईआर, पुलिस दस्तावेजों, सार्वजनिक अभिलेखों, मोटर वाहनों और सार्वजनिक साइनबोर्ड से जातिगत संदर्भों को हटाने के लिए व्यापक निर्देश जारी किए थे।

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