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एनकाउंटर के बाद तुरंत प्रमोशन-पुरस्कार पर रोक… इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जारी की सख्त गाइडलाइंस, पुलिस को लगाई फटकार

प्रयागराज: मुठभेड़ के नाम पर पुलिस द्वारा तुरंत प्रमोशन और गैलेंट्री अवॉर्ड देने की प्रथा पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि सजा देने का अधिकार सिर्फ न्यायपालिका के पास है, पुलिस के पास नहीं। किसी आरोपी को ‘एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल’ तरीके से सजा देने या पुलिसकर्मियों को बिना पूरी जांच के पुरस्कृत करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

जस्टिस अरुण कुमार देशवाल की एकलपीठ ने मिर्जापुर निवासी राजू उर्फ राजकुमार की जमानत याचिका मंजूर करते हुए 6 महत्वपूर्ण गाइडलाइंस जारी की हैं। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के PUCL बनाम महाराष्ट्र राज्य (2003) के फैसले में एनकाउंटर से जुड़ी स्पष्ट निर्देश दिए गए थे, लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस अक्सर इनका पालन नहीं करती। कोर्ट ने कई मामलों में पुलिसकर्मियों को चोट न लगने की बात पर सवाल उठाया और हथियारों के इस्तेमाल की वैधता पर भी संदेह जताया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की 6 प्रमुख गाइडलाइंस

1. मुठभेड़ में घायल होने पर तुरंत FIR दर्ज
  
आरोपी या किसी अन्य व्यक्ति को गंभीर चोट लगने पर पुलिस टीम को नजदीकी थाने में केस दर्ज कराना अनिवार्य होगा। जांच CBCID या किसी अन्य थाने की टीम करेगी, जिसकी निगरानी वरिष्ठ अधिकारी करेंगे।

2. FIR में पुलिसकर्मियों के नाम आरोपी के रूप में नहीं 

प्राथमिकी में मुठभेड़ में शामिल पुलिसकर्मियों को आरोपी या संदिग्ध के रूप में नामित करने की जरूरत नहीं।

3. घायल को तत्काल मेडिकल सहायता और बयान 

घायल व्यक्ति को तुरंत मेडिकल मदद दी जाए। चोटों की जांच के साथ मजिस्ट्रेट या मेडिकल अधिकारी की मौजूदगी में उसका बयान दर्ज किया जाए और फिटनेस सर्टिफिकेट जारी हो।

4. पूरी जांच के बाद रिपोर्ट कोर्ट को

एनकाउंटर की पूरी जांच पूरी होने के बाद रिपोर्ट सक्षम कोर्ट को सौंपी जाएगी, जो सुप्रीम कोर्ट के PUCL दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन करेगा।

5. तुरंत प्रमोशन या अवॉर्ड पर रोक

मुठभेड़ के तुरंत बाद किसी पुलिस अधिकारी को ‘आउट ऑफ टर्न’ प्रमोशन या गैलेंट्री अवॉर्ड नहीं दिया जाएगा। पुरस्कार की सिफारिश तभी होगी, जब स्वतंत्र जांच समिति में उसकी बहादुरी और आवश्यकता बिना किसी संदेह के साबित हो।

6. शिकायत का अधिकार और कार्रवाई 

यदि कोई नियम तोड़ा गया, दुर्व्यवहार हुआ या पक्षपात दिखा, तो पीड़ित परिवार सेशन जज से शिकायत कर सकता है। सेशन जज जांच कर उचित कार्रवाई करेंगे और जरूरत पड़ने पर मामला हाईकोर्ट भेज सकते हैं, जहां अवमानना की कार्रवाई शुरू हो सकती है।

यह एनकाउंटर मामलों में पारदर्शिता, जवाबदेही और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए बड़ा कदम माना जा रहा है। कोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को इन गाइडलाइंस का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया है।

अब यूपी पुलिस पर यह दबाव बढ़ गया है कि मुठभेड़ के बाद पुरस्कार या प्रमोशन की होड़ लगाने से पहले पूरी जांच और कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा। यह फैसला न सिर्फ कानून के शासन को मजबूत करेगा, बल्कि पुलिस सुधार की दिशा में भी महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है।

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