उत्तर प्रदेशराज्यलखनऊ

क्या आप जानते हैं यह क्या है?, क्यों खरीदते हैं इस शर्मनाम उपाय को

  • समाज कल्याण राज्यमंत्री असीम अरूण की फेसबुक पोस्ट हो रही वायरल
  • जब मोदी- योगी सीट बेल्ट लगाते हैं तब आपको सीट बेल्ट से परहेज क्यों?

लखनऊ। प्रदेश के समाज कल्याण राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार असीम अरूण आईपीएस अधिकारी से राजनीतिक बनें हैं। वे जहां उत्तर प्रदेश में महत्वपूर्ण पदों पर रहे, वहीं एसपीजी में भी अपनी सेवा दी है। एसपीजी ही प्रधानमंत्री की सुरक्षा का जिम्मा भी संभालती है। असीम अरूण ने सीट बेल्ट के स्थान पर प्रयोग किये जाने वाले उपकरण के संबंध में विस्तार से बताते हुए कहा कि जान बचाने के उपकरण को निष्क्रिय करना कितना सही है?।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का उदाहरण देते हुए कहा कि जब ये सीट बेल्ट के बगैर नहीं चलते तब आप क्यों। उनकी पोस्ट को हम जनहित में हू ब हू प्रस्तुत कर रहे हैं। वह इसलिए कि यह लोगों में चेतना जगा रहे हैं। यह ऐसा यंत्र है जिसका आविष्कार भारत में हुआ स्वीडन के उस आविष्कार को निष्क्रिय करने के लिए जो हमारी जान बचाने के लिए है। कितनी बड़ी विडंबना है यह।

हम विकसित भारत की यात्रा शुरू कर चुके हैं और केवल दो दशक में इसे पूरा कराने का इरादा भी हैं। लेकिन यात्रा को सफल बनाने के लिए जरुरी है पहले अपनी कुछ सामूहिक कमियां को दूर करें। स्व-आलोचना ही सुधार का पहला कदम है। हमारी एक बड़ी कमी है, कानून न मानना। ‘कानून के राज’ का मतलब केवल चोर, डकैत, गुंडों की नकेल कसना ही नहीं है, इसमें दिन प्रतिदिन के कार्यों में अनुशासन रखना भी शामिल है।

गाड़ियों में टक्कर होने पर यात्रियों को कैसे बचाया जा सकता है? कई कंपनियों ने तरह- तरह की सीट बेल्ट बनाईं लेकिन सबसे प्रभावी और उपयोग में आसान बेल्ट का आविष्कार किया स्वीडन की कंपनी वोल्वो ने। वही वोल्वो जिसकी बसें भारत में बहुत लोकप्रिय हैं। 1959 में बनी यह बेल्ट तेजी से लोकप्रिय होने लगी। इसका लाभ सब तक पहुंचें, इसलिए वोल्वो ने अपने पेटेंट को मुक्त कर दिया और सभी कंपनियों के वाहनों में यह लगने लगी।

भारत में निर्मित वाहनों में इसका होना और हमारा इसे लगाना अनिवार्य है। आपने कितने ही उदाहरण सुने होंगे जब सीट बेल्ट ने जान बचा ली हो या न लगाने पर चली गई हो। यह भी जानना जरुरी है कि एयर बैग भी तभी खुलते हैं जब सीट बेल्ट लगी हो। इतनी उपयोगी, जान बचाऊ, आसान सी चीज को कैसे लागू किया जाए? सामान्य तरीका है उल्लंघन पकड़े जाने पर दंड दिया जाए लेकिन उससे भी अच्छा तरीका है इशारे का। जब तक बेल्ट नहीं लगाएंगे गाड़ी टूँ- टूँ की आवाज करती रहेगी, याद दिलाने के लिए भी और दबाव बनाने के लिए भी। कितना नायाब उपाय है। इसे ह्यल्ल४ॅिी ३ँीङ्म१८ह्ण भी कहा गया है।

जब मैं एसपीजी में था तो बीएमडब्लयू, जर्मनी से कुछ प्रशिक्षक बुलाए गए हमारी ट्रेनिंग के लिए। उन्होंने हमसे पूछा कि आप और आपके ड्राइवर सीट बेल्ट क्यों नहीं लगाते। हमने कहा कि हमें फुर्ती के साथ गाड़ी से निकलना होता है, इसलिए। रही बात चोट की तो हम तो कमांडो हैं! उन्होंने हमें सीट बेल्ट के फायदे बताए और तेजी से खोलने के तरीके भी सिखाए। हम सब संतुष्ट हुए और एसपीजी ने भी सीट बेल्ट लगाना शुरू कर दिया। आप कभी भी मोदी जी को बिना सीट बेल्ट के नहीं देखेंगे। योगी जी भी हमेशा सीट बेल्ट लगाते हैं, तभी गाड़ी आगे बढ़ती है।

तो हम क्यों नहीं पहनते, हम इस शर्मनाक आविष्कार को क्यों खरीदते हैं? टूँ- टूँ को बंद करने के लिए या अपनी जान को खतरे में डालने के लिए। यह भी सोचें कि विकसित भारत का निर्माण सीट बेल्ट जैसे आविष्कार से होगा या उसको निष्क्रिय करने वाली युक्ति से। आपके मन में यह भी विचार आ रहा होगा कि ऐसी युक्ति को सरकार बैन क्यों नहीं कर देती, निर्माण पर रोक क्यों नहीं लगाती। लगा सकती है, लेकिन फिर यह ब्लैक मार्केट में बिकेगा, और महंगा। असली परिवर्तन जो जरूरी है- ‘कानून के राज’ का हर नागरिक सम्मान करे। दंड या टूँ- टूँ के कारण नहीं, सूझबूझ के साथ आत्मसात कर। यदि हमारी गाड़ी में है यह युक्ति और हमारे मन में कानून तोड़ने की प्रवृत्ति तो दोनों को आज ही निकाल फेंकते हैं और एक्सिलरेटर दबाते हैं विकसित भारत की यात्रा को तेज करने के लिए। गति सीमा का ध्यान रखते हुए।

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