उत्तर प्रदेशराज्यलखनऊ

वर्ल्ड रिकॉर्ड वाले रेलवे जंक्शन स्टेशन से 14 घंटे लेट चली ट्रैन!

गोरखपुर जंक्शन से बुधवार रात्रि 9:15 बजे चलनी थी राप्ती गंगा एक्सप्रेस

  • अगले दिन गुरुवार सुबह 11:17 बजे प्लेटफार्म से हुई रवाना, यात्री बेहाल
  • सबसे लम्बे प्लेटफार्म के नाम पर गिनीज बुक में दर्ज, पूर्वोत्तर रेलवे का मुख्यालय
  • रेलवे का कहना, नेशनल ट्रैन इंक्वॉयरी सिस्टम में अपडेट कर दिया गया था
  • उठे सवाल, यात्रियों में कई होते हैं आम, महिला वृद्ध वर्ग के जो मैसेज नहीं देख पाते

लखनऊ। गोरखपुर…वैश्विक रेलवे के नज़रिये से देखें तो गोरखपुर जंक्शन का नाम गिनीज बुक में दर्ज है क्योंकि यही माना जाता है कि यहां विश्व का सर्वाधिक लम्बा प्लेटफार्म है, दूसरे तरफ यदि राजनीतिक दृष्टि से आंकलन करें तो यह अकेले किसी एक शहर या जनपद का नाम नहीं बल्कि मौजूदा समय में ये महानगर यूपी की सत्ता-शासन का केंद्रबिंदु बना हुआ है, यही नहीं अभी कुछ ही दिनों पहले इसी रेलवे जंक्शन से पीएम मोदी ने सीएम योगी की मौजूदगी में भारतीय रेलवे के महत्वाकांक्षी रेल योजना के तहत वंदे भारत सुपरफास्ट ट्रैन को हरी झंडी भी दिखाई थी…संभवत: तब गोरखपुर रेलवे जंक्शन पर शुरू की गई इस महत्वपूर्ण रेल सुविधा को वहां के स्थानीय लोगों के अलावा जिस किसी भी वर्ग के रेल यात्री ने देखा होगा, सुना होगा…यही सोचा होगा कि चलो अब हमारे शहर की रेल सेवा धीरे-धीरे उच्चीकृत हो रही है और ऐसे में घंटों ट्रैनें की लेटलतीफी से मुक्ति भी मिलेगी।

मगर, बुधवार रात गोरखपुर के इन लोगों का दिवास्वप्न बेपटरी होता चला गया जब गोरखपुर जंक्शन से ओरिजिनेट होकर तय समय रात्रि 9:15 बजे चलने वाली 15005 राप्ती गंगा एक्सप्रेस ट्रैन एक-दो नहीं बल्कि तकरीबन 14 घंटे लेट होकर अगले दिन गुरुवार को सुबह 11:17 बजे देहरादून को रवाना हो पाई। ऐसे में इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस ट्रैन के जो भी यात्री गोरखपुर के आसपास से यात्रा कराने के लिये कई माह पहले रिजर्वेशन कराये होंगे, अपने उतरने वाले स्टेशन को लेकर क्या-क्या प्लानिंग की होगी…ऐसे में यदि उन्हें उसी स्टेशन पर रात से लेकर सुबह तक इस भीषण गर्मी में इतना लम्बा इंतजार करना पड़े तो गोरखपुर जंक्शन को लेकर उपरोक्त जो भी उपलब्धियां गिनाई जाती हैं, वो तो इन पीड़ित रेल यात्रियों के लिये बेमानी ही हैं।

हरिद्वार में होटल बुक था, अब तो सब राम भरोसे…!

वहीं इस प्रकरण को लेकर जब तरूणमित्र टीम ने उक्त ट्रैन के थर्ड एसी में रिजर्वेशन करा चुके यात्री समूह में एक महिला यात्री से बातचीत की तो उनका कहना रहा कि बुधवार रात नौ बजे के करीब ट्रैन को रवाना होना था, मगर हम लोगों को रेलवे स्टेशन पर कोई सही अपडेट नहीं दिया गया, ऐसे में हम ही नहीं बल्कि तमाम रेल यात्री इससे परेशान रहें, हम लोगों ने हरिद्वार में पहले ही होटल बुक कर लिया था, अब क्या होगा वहां जाने पर, जो भी पैसा ज्यादा पड़ेगा उसका भरपाई क्या रेलवे करेगा, अब तो आगे की यात्रा रामभरोसे ही रहेगी। आगे कहा कि वो तो गोरखपुर शहर से 50 किमी दूर अपने परिवार संग हरिद्वार जाने को इस ट्रैन से रिजर्वेशन कराई थीं, पर उन्हें क्या मालूम था यह गाड़ी इतना झेलाएगी।

मोबाइल मैसेज के सहारे छोड़ दिये सैकड़ों यात्री…!

गोरखपुर जंक्शन से इतने घंटे ट्रैन की लेटलतीफी के मामले में जब पूर्वोत्तर रेलवे मुख्यालय के प्रवक्ता से संपर्क किया गया तो उनका यही वॉट्स एप आया कि ‘प्लीज़ चेक ऑन एनटीईएस…यात्री नेशनल ट्रैन इंक्वॉयरी सिस्टम पर चेक करे, सब फीड है।’ वहीं जब इसको लेकर सार्वजनिक परिवहन सेवा से जुड़े जानकारों से बात की गई तो उनका यही कहना रहा कि केवल मोबाइल मैसेज के सहारे एकसाथ यात्रियों के इतने बड़े समूह को छोड़ देना, यह कहीं न कहीं गोरखपुर जंक्शन पर तैनात स्टेशन निदेशक, स्टेशन प्रबंधन, ऑपरेटिंग टीम, इंक्वायरी सिस्टम, सीएमआई, सीआरएस आरपीएफ और जो भी इतने बड़े और अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस स्टेशन पर तैनात हैं, उनकी भी जिम्मेदारी और जवाबदेही बनती है।

आगे कहना रहा कि केवल औपचारिक एनाउंस से काम नहीं चलेगा, ऐसे में मैनुअल तौर पर भी स्टेशन-प्लेटफार्म पर भोपू आदि के जरिये घोषणा करा देनी चाहिये थी, जिससे जो साधारण, आम, महिला या फिर वृद्धजन श्रेणी के यात्री रहें जोकि अक्सर कम ही मोबाइल मैसेज देख पाते हैं, या एनटीईएस जैसा कोई रेलवे एप्लीकेशन डाउनलोड कर पाते हैं, या फिर खोल पाते हैं…उनके कानों तक ता ट्रैन की देरी की बात पहुंच पाती, क्योंकि अभी भी देश-प्रदेश में रेल यात्रा करने वाले ऐसे असंख्य लोग हैं जो अभी भी ट्रैन पकड़ने से पहले वहां पर दिख रहे रेलवे स्टॉफ, टीटीई, वेंडर, चाय वाले या फिर कुली आदि से जरूर पूछते हैं कि भईया, ये गाड़ी फलां स्टेशन जाएगी न…ऐसे में इंडियन रेलवे कितना ही एडवांस क्यूं न हो जाये, मगर उसे यह तथ्य को स्वीकारना चाहिये कि रेल यात्रा का स्वरूप और उसमें सफर करने वाले यात्री समाज के हर क्लास के होते हैं, उनमें भी उनकी संख्या अधिक होती है जिनके पैरों में चप्पल भी नहीं होते…।

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