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BRICS : पश्चिम एशिया पर मतभेदों के कारण ब्रिक्स में संयुक्त वक्तव्य नहीं, एकतरफा प्रतिबंधों और आतंकवाद की कड़ी निंदा की गई

नई दिल्ली। ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों की बैठक में शुक्रवार को पश्चिम एशिया संकट से जुड़े मुद्दों पर मतभेदों के कारण औपचारिक संयुक्त वक्तव्य जारी नहीं हो सका बल्कि इसकी जगह जारी ‘आउटकम डाक्यूमेंट’ में गाजा संघर्ष विराम का समर्थन, एकतरफा प्रतिबंधों तथा आतंकवाद की कड़ी निंदा करने के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक वित्त संस्थाओं में सुधारों की पुरजोर वकालत की गयी।

ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की भारत की अध्यक्षता में दो दिन की बैठक के समापन पर जारी दस्तावेज में कहा गया है कि सदस्यों ने वैश्विक और क्षेत्रीय प्रमुख मुद्दों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया। उन्होंने राजनीतिक और सुरक्षा, आर्थिक और वित्तीय, सांस्कृतिक और लोगों के बीच आदान-प्रदान के तीन स्तंभों के तहत ब्रिक्स रणनीतिक साझेदारी के ढांचे को मजबूत करने की अपनी वचनबद्धता दोहराई। उन्होंने परस्पर सम्मान और समझ, समानता, एकजुटता, खुलापन, समावेशिता और सर्वसम्मति की ब्रिक्स भावना के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी दोहराई।

विदेश मंत्रालय में सचिव (आर्थिक संबंध ) सुधाकर दलेला ने बाद में संवाददाता सम्मेलन में सवालों के जवाब में कहा कि बैठक के परिणामों के बारे में समुचित दस्तावेज जारी किया गया है जो सभी सदस्यों के साझा दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करता है। उन्होंने कहा कि यह ब्रिक्स सम्मेलन के लिए अच्छा आधार उपलब्ध करायेगा और उम्मीद है कि सम्मेलन के दौरान आम सहमति का मार्ग प्रशस्त करेगा। दस्तावेज के अनुसार मंत्रियों ने भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के प्रति पूर्ण समर्थन व्यक्त किया, जिसका विषय है: “लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण।”

उन्होंने कहा कि ब्रिक्स सदस्यों के बीच सहयोग साझा चुनौतियों को संतुलित और समावेशी तरीके से संबोधित करने में मदद कर सकता है। ब्रिक्स की 20वीं वर्षगांठ के अवसर पर, मंत्रियों ने वैश्विक शासन में सुधार, इसे अधिक न्यायसंगत, समान, चुस्त, प्रभावी, सक्षम, उत्तरदायी, प्रतिनिधि, वैध, लोकतांत्रिक और जिम्मेदार बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई।

उन्होंने व्यापक परामर्श, संयुक्त योगदान और साझा लाभ की भावना के साथ एक मजबूत, समावेशी और संतुलित बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बढ़ावा देने पर जोर दिया। सदस्य देशों ने बहुपक्षवाद तथा बहुध्रुवीयता को मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय कानून, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों का पूरी तरह पालन करने की प्रतिबद्धता दोहराई।

उन्होंने कहा कि यह एक आवश्यक आधार है और इसमें संयुक्त राष्ट्र की केंद्रीय भूमिका है, जिसमें संप्रभु राज्य सहयोग कर शांति और सुरक्षा बनाए रखते हैं, सतत विकास को बढ़ावा देते हैं, लोकतंत्र, मानवाधिकार और मौलिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करते हैं, और समानता, न्याय और आपसी सम्मान की भावना पर आधारित सहयोग को बढ़ावा देते हैं।

मंत्रियों ने एकतरफा दबाव वाली कार्रवाइयों की निंदा की, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के विपरीत हैं, और दोहराया कि ऐसी कार्रवाई, विशेष रूप से एकतरफा आर्थिक प्रतिबंध और द्वितीय प्रतिबंध के रूप में, लक्षित देशों की सामान्य आबादी के मानवाधिकारों, जिसमें विकास, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा के अधिकार शामिल हैं, पर दूरगामी नकारात्मक प्रभाव डालती हैं। ये उपाय गरीब और संवेदनशील परिस्थितियों में रहने वाले लोगों को असमान रूप से प्रभावित करते हैं, डिजिटल अंतर को और बढ़ाते हैं और पर्यावरणीय चुनौतियों को गंभीर बनाते हैं।

उन्होंने इस तरह की अवैध कार्रवाइयों को समाप्त करने की अपील की, जो अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों को कमजोर करती हैं। मंत्रियों ने यह भी दोहराया कि ब्रिक्स सदस्य अंतरराष्ट्रीय कानून के विपरीत ऐसे प्रतिबंध नहीं लगाते और न ही उनका समर्थन करते हैं, जिनकी अनुमति संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा नहीं दी गई हो। मंत्रियों ने सभी तरह के आतंकवाद जो कभी भी, कहीं भी और किसी के द्वारा भी किया गया हो की पुरजोर निंदा की और इसे आपराधिक कृत्य बताते हुए अस्वीकार्य बताया।

उन्होंने पहलगाम आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की और आतंकवाद के सभी रूपों के खिलाफ लड़ाई के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, जिसमें सीमा पार आतंकवादियों की गतिविधियाँ, आतंकवाद का वित्तपोषण और सुरक्षित ठिकानों का मुद्दा शामिल है। उन्होंने दोहराया कि आतंकवाद को किसी भी धर्म, राष्ट्रीयता, सभ्यता या जातीय समूह से जोड़ा नहीं जाना चाहिए और आतंकवादी गतिविधियों में शामिल सभी लोग तथा उनके समर्थक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार जिम्मेदार ठहराए जाएं और न्याय के कठघरे में लाए जाएं।

उन्होंने आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता सुनिश्चित करने का आह्वान किया और आतंकवाद से निपटने में दोहरे मानकों को अस्वीकार किया। मंत्रियों ने आतंकवाद के खिलाफ देशों की प्राथमिक जिम्मेदारी पर जोर दिया और कहा कि आतंकवादी खतरे को रोकने और उसके खिलाफ वैश्विक प्रयास अंतरराष्ट्रीय कानून, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों, और प्रासंगिक अंतरराष्ट्रीय संधियों और प्रोटोकॉल, जैसे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून, अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी कानून और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून, के अनुपालन में होने चाहिए।

उन्होंने ब्रिक्स काउंटर-टेररिज़्म वर्किंग ग्रुप (सीटीडब्ल्यूजी) और इसके पांच उपसमूहों की गतिविधियों का स्वागत किया, जो ब्रिक्स काउंटर-टेररिज़्म स्ट्रैटेजी, ब्रिक्स काउंटर-टेररिज़्म एक्शन प्लान और सीटीडब्ल्यूजी दृष्टिकोण पत्र पर आधारित हैं। उन्होंने काउंटर-टेररिज़्म सहयोग को और गहरा करने की उम्मीद जताई। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के ढांचे में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर समग्र संधि के शीघ्र समापन और अपनाने का आह्वान किया और सभी संयुक्त राष्ट्र द्वारा नामित आतंकवादियों और आतंकवादी संस्थाओं के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई का समर्थन किया।

मंत्रियों ने विशेष रूप से युवा पीढ़ी में उग्रवाद और कट्टरवाद का मुकाबला करने के महत्व पर भी जोर दिया और ब्रिक्स देशों तथा उनकी सक्षम एजेंसियों के बीच सहयोग बढ़ाने, सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने की आवश्यकता पर भी बल दिया। कुछ सदस्यों के बीच पश्चिम एशिया की स्थिति को लेकर मतभेद थे। इस विषय पर ब्रिक्स के सदस्यों ने अपने-अपने राष्ट्रीय दृष्टिकोण प्रस्तुत किए और विचारों की एक श्रृंखला साझा की।

उनके द्वारा व्यक्त किए गए दृष्टिकोणों में वर्तमान संकट का शीघ्र समाधान खोजने की आवश्यकता, संवाद और कूटनीति का महत्व, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान, अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन, अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों के माध्यम से समुद्री वाणिज्य के सुरक्षित और अवरोधमुक्त प्रवाह का महत्व, तथा नागरिक अवसंरचना और नागरिक जीवन की सुरक्षा शामिल हैं। कई सदस्यों ने हाल की घटनाओं के वैश्विक आर्थिक स्थिति पर प्रभाव पर भी जोर दिया।

मंत्रियों ने पुनः दोहराया कि इजरायल-फिलिस्तीनी संघर्ष का न्यायसंगत और स्थायी समाधान केवल शांतिपूर्ण साधनों से ही संभव है और यह फिलिस्तीनी लोगों के वैध अधिकारों, जिसमें स्व-निर्णय का अधिकार और लौटने का अधिकार शामिल है, की पूर्ति पर निर्भर करता है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, जिसमें संबंधित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और महासभा के प्रस्ताव और अरब शांति पहल शामिल हैं, दो-राज्य समाधान के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के संदर्भ में फिलिस्तीन राज्य की पूर्ण सदस्यता के समर्थन की भी पुष्टि की।

इसमें 1967 की अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर एक संप्रभु, स्वतंत्र और व्यवहार्य फिलिस्तीन राज्य की स्थापना शामिल है, जिसमें गाजा पट्टी और पश्चिमी किरारा शामिल हैं और पूर्वी यरूशलेम इसकी राजधानी होगी, ताकि दो राज्य शांति और सुरक्षा के साथ एक-दूसरे के बगल में जीवन यापन कर सकें, इस दृष्टिकोण को साकार किया जा सके। उन्होंने माना कि गाजा पट्टी, कब्ज़े वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र का अविभाज्य हिस्सा है।

इस संदर्भ में उन्होंने पश्चिमी किनारा और गाजा पट्टी को फिलिस्तीनी प्रशासन के अंतर्गत एकीकृत करने के महत्व पर जोर दिया और फिलिस्तीनी लोगों के स्व-निर्णय के अधिकार, जिसमें उनके स्वतंत्र फिलिस्तीन राज्य का अधिकार शामिल है, की पुष्टि की। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वह फिलिस्तीनी प्रशासन का समर्थन करे ताकि वह सुधारों को लागू कर सके और फिलिस्तीनियों की स्वतंत्रता और राज्य निर्माण की वैध आकांक्षाओं को पूरा कर सके। हालाकि इसके कुछ पहलुओं पर एक सदस्य ने आपत्ति जतायी।

मंत्रियों ने अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार लाल सागर और बाब अल-मंदब जलडमरूमध्य में सभी राज्यों के जहाजों के नौवहन अधिकारों और स्वतंत्रताओं के सुनिश्चित करने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने सभी पक्षों द्वारा इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कूटनीतिक प्रयासों को बढ़ाने का प्रोत्साहन दिया, जिसमें संघर्ष के कारणों को संबोधित करना और संयुक्त राष्ट्र की अध्यक्षता में यमन की शांति प्रक्रिया तथा संवाद के समर्थन को जारी रखना शामिल है।

उन्होंने यमन में मानवीय संकट, जिसमें खाद्य सुरक्षा और बुनियादी सेवाओं तक पहुँच शामिल है, को संबोधित करने की तत्काल आवश्यकता पर भी बल दिया। मंत्रियों ने इस बात पर जोर दिया कि दीर्घकालिक स्थिरता, समृद्धि और सुरक्षा प्राप्त करने के प्रयासों में क्षेत्रीय देशों की भूमिकाओं और योगदान की आवश्यकता है। इसके भी कुछ हलुओं पर एक सदस्य ने आपत्ति जताई। इसी तरह की आपत्तियों के चलते बैठक में आम सहमति नहीं बन पाई और संयुक्त वक्तव्य जारी नहीं हो सका।

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