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सफलता-विफलता की कहानी, राधिका अंबानी की जुबानी, बताया क्यों सीखने की आदत कभी नहीं रुकती

राधिका अंबानी इन दिनों संस्कृति और परोपकार से जुड़े कामों को आगे बढ़ाने में जुटी हुई हैं। हाल ही में राधिका ने छात्रों के एक ग्रुप के साथ बातचीत में हिस्सा लिया, जहां उन्होंने जिंदगी, सीखने और जीवन के मकसद के प्रति अपने विचार साझा किए। उनके विचारों ने सभी पर गहरी छाप छोड़ी है।

युवाओं को संबोधित करते हुए राधिका अंबानी ने सफलता, असफलता, जीवन भर सीखने और समाज में योगदान देने की जिम्मेदारी को लेकर खुलकर बात की। उनका मैसेज सरल, लेकिन प्रभावशाली रहा: सफलता की परिभाषा हर शख्स के लिए अपनी होनी चाहिए, इसमें लगातार विकास होना चाहिए और इसे कभी भी किसी की पहचान का एकमात्र पैमाना नहीं बनाना चाहिए।

अनंत अंबानी की पत्नी और भारत के सबसे प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय परिवार का हिस्सा बनने से पहले राधिका ने न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया। उन्होंने खुद की मर्जी से ही भारत लौटने का फैसला लिया था। उनका कहना है कि यह फैसला उनके लिए बिल्कुल भी मुश्किल भरा नहीं था।

राधिका अंबानी आज एनकोर हेल्थकेयर में डायरेक्टर ऑफ डोमेस्टिक मार्केटिंग हैं। वह सफलता को लेकर बहुत सोच-समझकर बात करती हैं। इससे यह पता चलता है कि उन्होंने इस सवाल पर गहराई से सोचा है और आसान जवाबों से आगे बढ़कर सोचने की कोशिश की है।

उनका मानना है, ‘शक्ति, प्रसिद्धि और पैसा सफलता के अच्छे मापदंड हैं, क्योंकि लोग इन्हें माप सकते हैं।’ मगर राधिका के लिए सफलता का मतलब कुछ और ही है, जिसे उन्होंने काम के शुरुआती और अनिश्चितताओं से भरे दिनों में खुद के लिए तय किया था। उन्होंने बताया, ‘हर सुबह मैं खुद से सवाल करती थी: क्या मैंने आज नौकरियां बढ़ाई हैं? यही मेरा मुख्य एजेंडा बन चुका था।’

यह सफलता को कुछ हासिल करने के बजाय योगदान करने के नजरिए से देखता है। उनका मानना है कि आज के युवाओं को इस सोच की बहुत ज्यादा जरूरत है। राधिका के मुताबिक, आज बेहतर प्रदर्शन करने और सबकी उम्मीदों पर खरा उतरने का दबाव सबसे ज्यादा है। इस वजह से कभी-कभी इंसान भीतर से असहज या परेशान हो उठता है।

राधिका ने स्वीकार किया कि उन्होंने खुद भी इस डर को भीतर से महसूस किया है। उन्होंने कहा, ‘मैं 31 साल की हूं। 20 से 30 साल की उम्र के बीच मुझे असफल होने से बहुत ज्यादा डर लगता था। जब आपको लगातार बताया जाता है कि आप जिंदगी में कुछ बड़ा करेंगे, तो आप फेल होने से इतना ज्यादा डरने लगते हैं कि आप कुछ कर ही नहीं पाते हैं।’ इस समस्या का समाधान उन्होंने आत्मविश्वास में नहीं, बल्कि काम करने में ढूंढा। छोटे-छोटे फैसले लेने, छोटी जीत हासिल करने और खुद पर भरोसा बनाने से।

नारीवाद यानी फेमिनिज्म पर राधिका अंबानी की सोच बिल्कुल साफ है। जब उनसे सवाल हुआ कि उनके लिए फेमिनिज्म का क्या मतलब है, क्योंकि वह एक चुनौती भरे कॉर्पोरेट रोल में काम कर रही हैं और उन पर एक प्रतिष्ठित परिवार की अपेक्षाएं भी हैं, तो उन्होंने इसका जो जवाब दिया, वो एक नया नजरिया था। उन्होंने कहा, ‘हम उस दिन जीतेंगे जिस दिन यह सवाल सिर्फ महिलाओं के लिए नहीं रह जाएगा।’

राधिका ने बताया कि उनका पालन-पोषण एक ऐसी दुनिया में हुआ है, जहां महिलाओं का दबदबा था। उनकी शादी भी ऐसे ही एक परिवार में हुई है। उनके मुताबिक, उनकी मां और सास ऐसी मजबूत महिलाएं हैं, जिन्हें किसी भी चीज के बारे में सिखाना या समझाना बहुत मुश्किल है। लेकिन वह साफ तौर पर यह भी मानती हैं कि बराबरी के लिए सिर्फ महिलाओं की मजबूती का आधार काफी नहीं है। उनका तर्क है कि असली काम महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों को भी शिक्षित करने में है।

अपनी शादी के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘आज हम अलग हैं, लेकिन हम बराबर भी हैं। कुछ ऐसी जगहें होती हैं, जहां अनंत कमान संभालते हैं और कुछ ऐसी भी जगहें होती हैं, जहां मैं फैसला लेती हूं।’ लेकिन इस साझेदारी के पीछे एक गहरी बात है: आर्थिक आजादी बहुत जरूरी है। राधिका ने कहा, ‘अपनी जिंदगी में कभी भी किसी चीज से सिर्फ इसलिए नहीं बंध जाएं, क्योंकि आपके पास बाहर निकलने का कोई ऑप्शन नहीं है। यह बहुत खतरनाक स्थिति होती है।’

राधिका की आवाज इसलिए अलग है, क्योंकि वे वैश्विक नागरिक और भारतीय जड़ों से जुड़ी होने- इन दोनों पहचानों को बहुत सहजता से साथ लेकर चलती हैं।

आज का दौर एल्गोरिदम वाला है, जहां लोग सोशल मीडिया पर अलग-अलग धड़ों में बंटे हुए हैं। इसे लेकर राधिका एक जरूरी सलाह देती हैं: ‘किसी को भी खुद को बांटने का मौका नहीं देना है। अलग-अलग राय पढ़ें। सहिष्णुता और स्वीकार्यता को अपनाएं। ये दोनों बहुत अलग चीजें हैं।’

आखिर में उनके विचारों से यही सार निकलता है कि बिना किसी मकसद के मिलने वाली सफलता सिर्फ शोर के अलावा कुछ नहीं है। बिना शिक्षा के फेमिनिज्म अधूरा है और वैश्विक सोच का मतलब तभी है जब आप अपनी जड़ों से जुड़े रहें।

यह आर्टिकल ‘इंडियाज़ इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस’ (IIMUN) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में छात्रों के साथ राधिका अंबानी की बातचीत पर आधारित है।

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