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सद्भावना दिवस : न चाहते हुए भी राजनीति में आए थे राजीव गांधी, नीति निर्माण में किए अहम बदलाव

“भारत एक प्राचीन देश, लेकिन एक युवा राष्ट्र है। मैं जवान हूं। मेरा भी एक सपना है। मेरा सपना है भारत को मजबूत, स्वतंत्र, आत्मनिर्भर, दुनिया के सभी देशों में से प्रथम रैंक में लाना और मानव जाति की सेवा करना।” ये देश के उस सबसे युवा प्रधानमंत्री के शब्द थे, जिनकी भूमिका भारत को आधुनिक, समृद्ध और सशक्त राष्ट्र बनाने में विशेष रही। उन्होंने सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत को विश्व में वर्तमान स्थान दिलाया और इसीलिए उन्हें भारत में ‘सूचना प्रौद्योगिकी का जनक’ कहा जाने लगा था। यह कहानी है 40 वर्ष की उम्र में प्रधानमंत्री बनने वाले राजीव गांधी की, जिनकी जयंती को हर साल ‘सद्भावना दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

20 अगस्त 1944 को मुंबई (बम्बई) में जन्मे राजीव गांधी तब महज तीन साल के थे, जब भारत स्वतंत्र हुआ और उनके नाना स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने। बाद में उनके माता-पिता लखनऊ से नई दिल्ली आकर बस गए।

राजीव गांधी ने अपना बचपन अपने नाना के साथ तीन मूर्ति हाउस में बिताया, जहां इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में कार्य किया। वे कुछ समय के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल गए लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया। वहां उनके कई मित्र बने जिनके साथ उनकी आजीवन दोस्ती बनी रही। बाद में उनके छोटे भाई संजय गांधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया, जहां दोनों साथ रहे।

स्कूल से निकलने के बाद राजीव गांधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए लेकिन जल्द ही वे वहां से हटकर लंदन के इंपीरियल कॉलेज चले गए। उन्होंने वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की।

यह तो स्पष्ट था कि राजनीति में अपना करियर बनाने में उनकी कोई रूचि नहीं थी। उनके सहपाठियों के अनुसार, उनके पास दर्शन, राजनीति या इतिहास से संबंधित पुस्तकें न होकर विज्ञान व इंजीनियरिंग की कई पुस्तकें हुआ करती थीं। हालांकि, संगीत में उनकी बहुत रुचि थी। उन्हें पश्चिमी और हिंदुस्तानी शास्त्रीय और आधुनिक संगीत पसंद था। उन्हें फोटोग्राफी और रेडियो सुनने का भी शौक था।

हवाई उड़ान उनका सबसे बड़ा जुनून था। अपेक्षानुसार इंग्लैंड से घर लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ्लाइंग क्लब की प्रवेश परीक्षा पास की और कमर्शियल पायलट का लाइसेंस हासिल कर लिया। जल्द ही वे घरेलू राष्ट्रीय जहाज कंपनी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए।

आसपास राजनीतिक गतिविधियों और सियासी हलचलों के बावजूद वे अपना निजी जीवन जीते रहे लेकिन 1980 में एक विमान दुर्घटना में उनके भाई संजय गांधी की मौत ने सारी परिस्थितियां बदलकर रख दीं। उन पर राजनीति में प्रवेश करने और अपनी मां को राजनीतिक कार्यों में सहयोग करने का दवाब बन गया।

फिर कई आंतरिक और बाहरी चुनौतियां भी सामने आकर खड़ी हो चुकी थीं। पहले उन्होंने इन दबावों का विरोध किया लेकिन बाद में वे उनकी ओर से दिए गए तर्क से सहमत हो गए। उन्होंने अपने भाई की मृत्यु के कारण खाली हुए उत्तर प्रदेश के अमेठी संसदीय क्षेत्र का उपचुनाव जीता। यहां से कांग्रेस के लिए नया उदय हुआ।

देश में पीढ़ीगत बदलाव होने पर राजीव गांधी को देश के इतिहास में सबसे बड़ा जनादेश प्राप्त हुआ था। अपनी मां की हत्या के शोक से उबरने के बाद उन्होंने लोकसभा के लिए नए चुनाव कराने का आदेश दिया। उस चुनाव में कांग्रेस को पिछले सात चुनावों की तुलना में सर्वाधिक वोट मिले और पार्टी ने 508 में से रिकॉर्ड 401 सीटें हासिल कीं।

करोड़ों भारतीयों के नेता के रूप में इस तरह की शानदार शुरुआत किसी भी परिस्थिति में उल्लेखनीय मानी जाती है। यह इसलिए भी अद्भुत है क्योंकि वे उस राजनीतिक परिवार से संबंधित थे, जिसकी चार पीढ़ियों ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान और इसके बाद भारत में शासन किया जबकि राजीव गांधी राजनीति में अपने प्रवेश को लेकर अनिच्छुक थे और उन्होंने राजनीति में देर से प्रवेश भी किया था।

उनके सामने आगे इससे भी अधिक मुश्किल परिस्थितियां आने वाली थीं जिसमें उनके व्यक्तित्व का परीक्षण होना था। राजीव गांधी से ज्यादा दुखद और कष्टकर परिस्थिति में कोई सत्ता में क्या आ सकता है, जब 31 अक्टूबर 1984 को अपनी मां की क्रूर हत्या के बाद वे कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बने थे लेकिन व्यक्तिगत रूप से इतने दुखी होने के बावजूद उन्होंने संतुलन, मर्यादा और संयम के साथ राष्ट्रीय जिम्मेदारी का अच्छे से निर्वहन किया।

महीनेभर के लंबे चुनाव अभियान के दौरान राजीव गांधी ने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के लगभग सभी भागों में जाकर 250 से अधिक सभाएं कीं और लाखों लोगों से आमने-सामने मिले।

स्वभाव से गंभीर लेकिन आधुनिक सोच और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले राजीव देश को दुनिया की उच्च तकनीकों से पूर्ण करना चाहते थे। जैसा कि वे बार-बार कहते थे कि भारत की एकता को बनाए रखने के उद्देश्य के अलावा उनके अन्य प्रमुख उद्देश्यों में से एक है 21वीं सदी के भारत का निर्माण।

हालांकि नियति को कुछ और ही मंजूर था। जिस तरह राजीव गांधी का एक घटनाक्रम के कारण राजनीति में आना हुआ था, ठीक उसी तरह एक अन्य घटना ने कांग्रेस को बिल्कुल सूना कर दिया। 21 मई 1991 को मंगलवार का दिन था, जो नेहरू-गांधी परिवार और कांग्रेस के लिए अमंगल साबित हुआ था। राजीव गांधी की तमिलनाडु के श्रीपेरुमबुदुर में हत्या कर दी गई थी।

20 मई 1991 को राजीव गांधी तकरीबन 5 बजे अपने निवास (10 जनपथ) से भुवनेश्वर और विशाखापट्टनम होते हुए श्रीपेरुमबुदुर जाने के लिए निकले थे। श्रीपेरुमबुदुर में उन्हें 21 मई को पहुंचना था और शाम साढ़े 8 बजे उनकी सभा थी। यूं तो राजीव गांधी की ये आखिरी चुनावी यात्रा थी लेकिन वो दिन उनकी जिंदगी का आखिरी सफर बन गया।

21 मई को जो होना था, उसकी रेकी और मॉक ड्रिल 12 मई को कर ली गई थी। राजीव गांधी की हत्या का प्लान बनाने वाला एलटीटीई प्रमुख प्रभाकरण इस मामले में कोई लापरवाही नहीं बरतना चाहता था। इसलिए उसने इस काम के लिए अपने सबसे भरोसेमंद आदमी शिवरासन को चुना था। प्लान को पूरा करने के लिए प्रभाकरण ने शिवरासन की चचेरी बहनों धनु और शुभा को उसके साथ भारत भेज दिया था।

शिवरासन इन दोनों को हत्या की साजिश में शामिल दो अन्य लोग नलिनी और मुरगन के घर ले गया। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को उस दिन तमिलनाडु के श्रीपेरुमबुदुर में चुनावी रैली को संबोधित करना था। रैली में भारी भीड़ थी, राजीव गांधी जिंदाबाद के नारे गूंज रहे थे और इसी भीड़ में धनु और शुभा भी शामिल थीं। धनु की कमर पर ही जानलेवा बम बेल्ट बंधी थी। प्लान था कि धनु फेल हुई तो शोभा इस काम को पूरा करेगी।

राजीव गांधी पहुंचे तो सुरक्षा घेरा तोड़कर धनु उसमें घुसी। उसने राजीव गांधी को चंदन की माला पहनाई और पैर छूने के लिए झुकी और कमर पर बंधे बम बेल्ट का बटन दबा दिया, जिसने राजीव गांधी समेत 16 लोगों की जान ले ली। इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई और कई गिरफ्तारियां हुईं। इससे पहले पुलिस शुभा और शिवरासन को पकड़ पाती, शुभा ने जहर खा लिया और शिवरासन ने खुद को गोली मार ली। सीबीआई ने ये साबित किया कि राजीव गांधी की हत्या और साजिश को एलटीटीई ने ही अंजाम दिया था।

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