उत्तर प्रदेशराज्यलखनऊ

संभल की जामा मस्जिद के इमाम समेत तीन पर FIR, जमीन कब्जा करने के आरोप

संभल। वृक्षारोपण के लिए आरक्षित करोड़ों रुपये मूल्य की सरकारी भूमि पर कथित रूप से अवैध कब्जा कर मस्जिद, दरगाह और मकान निर्माण कराने के आरोप में शाही जामा मस्जिद के इमाम समेत तीन लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। मामला पहले से राजस्व न्यायालय में विचाराधीन है और अब आपराधिक मुकदमा दर्ज होने के बाद प्रकरण ने नया मोड़ ले लिया है।

तहसील संभल में तैनात लेखपाल मुकेश कुमार यादव द्वारा कोतवाली संभल में दर्ज कराई गई रिपोर्ट में कहा गया है कि संभल-चंदौसी मार्ग स्थित सैफ खां सराय क्षेत्र की सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा किया गया है। यह भूमि सार्वजनिक प्रयोजन और वृक्षारोपण के लिए आरक्षित थी, लेकिन उस पर कब्जा कर मस्जिद, दरगाह और मकान का निर्माण करा लिया गया। साथ ही भूमि को कथित रूप से फर्जी तरीके से वक्फ बोर्ड में दर्ज कराने का भी आरोप लगाया गया है। पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार बिश्नोई ने बताया कि लेखपाल की शिकायत के आधार पर शाही जामा मस्जिद के इमाम आफताब हुसैन वारसी, उनके भाई मेहताब हुसैन तथा एक अन्य व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। पुलिस मामले की जांच कर रही है।

फैसला सुरक्षित रखा

यह मामला पहले से जिलाधिकारी न्यायालय में भी विचाराधीन है। प्रशासन का कहना है कि सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा कर धार्मिक ढांचे और अन्य निर्माण किए गए थे। इस संबंध में तहसीलदार संभल द्वारा राजस्व न्यायालय में कार्रवाई की गई थी। प्रशासन की ओर से भूमि को कब्जामुक्त कराने के लिए बेदखली की कार्रवाई भी गई। अपर जिला शासकीय अधिवक्ता (राजस्व) गजेंद्र सिंह ने बताया कि सरकारी जमीन पर कब्जा कर मस्जिद, दरगाह और अन्य निर्माण किए जाने की रिपोर्ट संबंधित लेखपाल द्वारा न्यायालय में प्रस्तुत की गई थी। इसके आधार पर बेदखली के आदेश भी पारित किए गए। 22 मई को मामले में अंतिम बहस पूरी हो चुकी है और जिलाधिकारी ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। वहीं मुकदमा दर्ज होने के बाद मामले में आगे की जांच और न्यायालय के निर्णय पर सभी की निगाहें टिकी हैं।

ग्राम समाज की संपत्ति की गई थी घोषित

तहसीलदार धीरेंद्र कुमार सिंह के अनुसार ये जमीन चकबंदी के दौरान वृक्षारोपण के लिए आरक्षित की गई थी। वर्ष 1972 में इस भूमि को ग्राम समाज की संपत्ति घोषित किया गया था। राजस्व अभिलेखों के अनुसार यह भूमि फसली वर्ष 1359 से अब तक कभी भी किसी व्यक्ति के निजी स्वामित्व में दर्ज नहीं रही है। प्रशासन का दावा है कि भूमि पूरी तरह सरकारी है और सार्वजनिक उपयोग के लिए सुरक्षित रखी गई थी। राजस्व विभाग के अधिकारियों के अनुसार लगभग छह माह पूर्व इस मामले में भी कार्रवाई शुरू की गई थी। प्रशासनिक आंकड़ों के मुताबिक संबंधित भूमि का अनुमानित बाजार मूल्य करीब 6 करोड़ 94 लाख 19 हजार रुपये है। इसी कारण यह मामला प्रशासन की प्राथमिकता में शामिल रहा है। प्रशासन का कहना है कि सरकारी भूमि, तालाब, चारागाह और सार्वजनिक उपयोग की अन्य संपत्तियों पर अवैध कब्जे किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे।

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