लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों ने किया कमाल, बनाई प्लास्टिक से ईंधन बनाने वाली सस्ती मशीन

लखनऊ विश्वविद्यालय के अभियांत्रिकी एवं तकनीकी संकाय के छात्रों ने दो ऐसे अनूठे और किफायती तकनीकी मॉडल विकसित किए हैं, जो आपदा प्रबंधन, सड़क सुरक्षा और प्लास्टिक कचरा प्रबंधन की दिशा में बड़े गेम चेंजर साबित हो सकते हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन विभाग के मुस्कान, गौरव, अमित और आयुष ने डॉ. मनोज कुमार जैन के निर्देशन में एक विशेष ट्रैफिक मॉडल तैयार किया है। यह मॉडल पहाड़ी रास्तों के अंधे मोड़ों, प्राकृतिक आपदाओं और हाईवे निर्माण के समय यातायात को सुरक्षित बनाएगा।
इसमें एड्रूइनो नानो और लोरा (लॉग रैंज) तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिससे मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट ठप होने पर भी यह लंबी दूरी तक काम करता है। पूरी तरह सोलर पैनल से संचालित होने के कारण यह बिजली संकट वाले सुदूर क्षेत्रों में भी चालकों को दुर्घटनाओं के प्रति पहले ही सचेत कर देगा। मैकेनिकल इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष के छात्रों इरम ज़ेया, वत्सल विश्वकर्मा, सुमित सिंह, प्रियांशु और गौरव रावत ने डॉ. प्रवीण कुमार राय के मार्गदर्शन में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में यह मॉडल विकसित किया है।
न्यूनतम लागत में तैयार किया मॉडल
छात्रों ने न्यूनतम लागत में ”मिनी पायरोलिसिस रिएक्टर” का निर्माण किया है, जो प्लास्टिक कचरे से कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) का विकल्प तैयार करता है। बाजार में इस तरह की मशीनों की कीमत कई लाख रुपये से अधिक होती है। यह मशीन एचडीपीई और एलडीपीई प्लास्टिक कचरे को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर, ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में उसे 350 से 500 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर गर्म करती है। इस प्रक्रिया से उत्पन्न होने वाली हाइड्रोकार्बन गैस कंडेनसर (संघनित्र) से होकर गुजरती है और तरल ईंधन में परिवर्तित हो जाती है।
छात्रों का यह प्रयास देश की वास्तविक समस्याओं का व्यावहारिक और किफायती समाधान खोजने की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है। यह तकनीक न केवल आपदा के समय लोगों की जान बचाने में उपयोगी साबित होगी, बल्कि प्लास्टिक प्रदूषण जैसी गंभीर चुनौती से निपटने में भी एक ‘गेम-चेंजर’ बनकर उभरेगी… प्रो. सतेन्द्र पाल सिंह, डीन, इंजीनियरिंग संकाय, लखनऊ विश्वविद्यालय



