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आधी आबादी, पूरी हिस्सेदारी : राजनीति और नीति निर्माण के केंद्र में उभरती ‘नारी शक्ति’

एक दौर ऐसा भी था जब भारतीय राजनीति में महिलाओं की भूमिका को केवल ‘वोट बैंक’ या साइलेंट वोटर के तौर पर देखा जाता था। आज, भारत एक ऐसे ऐतिहासिक बदलाव के मुहाने पर खड़ा है, जहां महिलाएं सिर्फ नीतियां मानने वाली नहीं बल्कि नीतियां बनाने वाली बन रही हैं। इस बदलाव की सबसे मजबूत धुरी है ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’। यह देश की आधी आबादी को सत्ता और सदन में उनका वाजिब हक दिलाने की एक पक्की गारंटी है।

सोमवार को ‘नारी शक्ति वंदन सम्मेलन’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन ने इसी बदलते भारत की तस्वीर पेश की। संदेश स्पष्ट था कि भारत का विकास तब तक अधूरा है, जब तक उसकी अगुवाई महिलाएं न करें।

प्रधानमंत्री मोदी ने सम्मेलन में अपने वक्तव्य में जिस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया, वह था, ‘महिला विकास’ से आगे बढ़कर ‘महिलाओं के नेतृत्व में विकास’ की ओर कदम बढ़ाना।

प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम कोई राजनीतिक दांव नहीं है बल्कि यह एक नए और सशक्त भारत की जरूरत है। उन्होंने कहा कि जब महिलाएं नीति निर्माण की टेबल पर बैठती हैं, तो फैसले अधिक संवेदनशील, समावेशी और दूरदर्शी होते हैं। परिवार चलाने वाली महिला जब देश चलाने में अपनी भूमिका निभाएगी, तो वह शिक्षा, स्वास्थ्य और जमीनी विकास जैसे मुद्दों को राजनीति के केंद्र में लेकर आएगी। उनका यह बयान इस बात का सूचक है कि सरकार महिलाओं को केवल लाभार्थी के रूप में नहीं बल्कि राष्ट्र-निर्माता के रूप में देख रही है।

संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रितिशत आरक्षण सुनिश्चित करने वाला यह अधिनियम राजनीति के परिदृश्य को पूरी तरह से बदल देगा। वहीं, सवाल यह है कि नीति निर्माण में महिलाओं का होना इतना अहम क्यों है?

दरअसल, जब महिलाएं सत्ता में होती हैं, तो नीतियां बुनियादी ढांचे के साथ-साथ मानव विकास सूचकांकों (जैसे मातृ स्वास्थ्य, शिशु पोषण, और शिक्षा) पर अधिक केंद्रित होती हैं। महिलाएं अक्सर जमीनी समस्याओं (जैसे पीने के पानी की किल्लत, रसोई गैस की महंगाई, और कानून-व्यवस्था) का सीधा सामना करती हैं। इसलिए जब वे नीतियां बनाती हैं, तो उनके समाधान अधिक व्यावहारिक होते हैं। कई वैश्विक शोध बताते हैं कि स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं के नेतृत्व वाले क्षेत्रों में सुशासन और पारदर्शिता का स्तर अपेक्षाकृत बेहतर होता है।

कोई भी महिला सीधे संसद या विधानसभा नहीं पहुंच सकती, जब तक कि वह आर्थिक और सामाजिक रूप से स्वतंत्र न हो। केंद्र सरकार की कई योजनाएं एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार कर रही हैं, जो महिलाओं को आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता दे रहा है, जो उन्हें नेतृत्व की ओर प्रेरित करता है।

लखपति दीदी योजना स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बना रही है। इसका लक्ष्य तीन करोड़ महिलाओं को कम से कम 1 लाख रुपए की वार्षिक आय तक पहुंचाना है, जिससे वे अपने परिवार और गांव की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन सकें।

नमो ड्रोन दीदी योजना ग्रामीण स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को ड्रोन चलाने का प्रशिक्षण और 80 प्रतिशत तक सब्सिडी (8 लाख रुपए तक) प्रदान करती है, जिससे वे कृषि में ड्रोन तकनीक का उपयोग कर सकें। यह योजना महिलाओं को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ के रूप में स्थापित कर रही है।

प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत दिए गए कुल ऋणों में से लगभग 68 प्रतिशत से अधिक ऋण महिला उद्यमियों को मिले हैं। यह योजना महिलाओं को रोजगार मांगने वाले की बजाय रोजगार देने वाला बना रही है।

पीएम आवास योजना के तहत दिए जा रहे घरों की रजिस्ट्री में महिलाओं को प्राथमिकता दी जा रही है। घर का मालिकाना हक मिलने से समाज और परिवार में महिलाओं के निर्णय लेने की क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।

उज्ज्वला योजना और जल जीवन मिशन योजनाओं ने महिलाओं के हर दिन के कई घंटे बचाए हैं। इस बचे हुए समय का उपयोग वे अपने कौशल विकास और आर्थिक आय बढ़ाने में कर रही हैं।

गर्भवती महिलाओं के लिए मातृ वंदना योजना के तहत 5,000 रुपए की सहायता और पोषण और बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और सुकन्या समृद्धि योजना के माध्यम से महिलाएं शिक्षा और आर्थिक सुरक्षा पा रहीं हैं। सुकन्या समृद्धि योजना माता-पिता को कम उम्र से ही बेटी के भविष्य के लिए बचत करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है, जो महिलाओं के लिए वित्तीय स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता का आधार है।

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