2 साल से कैद, ढहती सेहत और न्याय का इंतजार: एडवोकेट कृपा शंकर और बिंदा सिंह की रिहाई के लिए उठी आवाज

लखनऊ/प्रयागराज | उत्तर प्रदेश में ‘माओवादी कनेक्शन’ के नाम पर गिरफ्तार किए गए इलाहाबाद हाई कोर्ट के अधिवक्ता कृपा शंकर सिंह और सामाजिक कार्यकर्ता बिंदा सोना सिंह की कैद के दो साल पूरे होने पर मानवाधिकार संगठनों ने सरकार और जेल प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कैम्पेन अगेंस्ट स्टेट रिप्रेशन (CASR) ने एक कड़ा बयान जारी कर दोनों की तत्काल रिहाई और उन्हें बेहतर चिकित्सा सुविधा देने की मांग की है।
वकील और शिक्षिका पर ‘वैचारिक’ प्रहार?
बता दें कि 5 मार्च 2024 को यूपी एटीएस (ATS) ने छापेमारी कर इन्हें गिरफ्तार किया था। एडवोकेट कृपा शंकर सिंह वर्षों से अदालतों में गरीबों और राजनीतिक बंदियों की आवाज रहे हैं, वहीं बिंदा सोना सिंह एक पूर्व शिक्षिका हैं। CASR का आरोप है कि इनके पास से कोई ठोस आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली, फिर भी इन्हें ‘माओवादी’ बताकर जेल में सड़ाया जा रहा है। संगठन ने इसे “असहमति की आवाज को अपराध घोषित करने का खतरनाक पैटर्न” करार दिया है।
जेल के भीतर अमानवीय हालात: मतिभ्रम और बीमारियां
प्रेस वक्तव्य में जेल के भीतर की भयावह स्थिति का खुलासा किया गया है:
- एडवोकेट कृपा शंकर सिंह: उन्हें ‘सेमी-आइसोलेशन’ (अर्ध-एकांत कारावास) में रखा गया है। लंबे समय तक अकेले रहने के कारण वे ‘हैलुसिनेशन’ (मतिभ्रम) और भारी मानसिक तनाव का शिकार हो गए हैं। उन्हें हाइड्रोसील की बीमारी है और जेल डॉक्टरों ने सर्जरी की सलाह दी है, लेकिन प्रशासन मौन है।
- बिंदा सोना सिंह: वे स्त्री-रोग संबंधी गंभीर समस्याओं से जूझ रही हैं। हाल ही में जेल में गिरने से उनके पैर में मोच आई, इसके बावजूद उन्हें लंगड़ाते हुए अदालत में पेश होने पर मजबूर किया गया।
‘तारीख पर तारीख’ लेकिन सुनवाई नहीं
न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले एक साल से इनकी जमानत याचिकाएं हाई कोर्ट में लंबित हैं। 19 फरवरी को भी सुनवाई टल गई। CASR के अनुसार, “जब सजा से पहले की हिरासत ही सजा बन जाए, तो न्याय का मूल सिद्धांत (जेल नहीं, जमानत) खत्म हो जाता है।”
CASR की दो टूक मांग
भीम आर्मी, रिहाई मंच और मजदूर पत्रिका सहित दर्जनों संगठनों के गठबंधन CASR ने साफ कहा है कि बिना दोष सिद्ध हुए दो साल की कैद न्याय नहीं, बल्कि तंत्र द्वारा दी गई प्रताड़ना है। उन्होंने मांग की है कि:
- दोनों को तत्काल रिहा किया जाए।
- स्वतंत्र और बेहतर चिकित्सा जांच कराई जाए।
- ’माओवादी’ बताकर कार्यकर्ताओं को निशाना बनाना बंद हो।



